गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे सखि, अधीरं (चञ्चलं) [अतएव] मुखरं (सशब्दं) मञ्जीरं (नूपुरं) केलिषु (क्रीड़ासु) लोलं (अतिचपलं); [अतः अभीष्टविरोधित्वात्] रिपुमिव (शत्रुवत्) त्यज; सतिमिरपुञ्जं (तमसावृतं) कुञ्जं चल; नीलनिचोलं (तामस्यभिसारिकोचितं नीलवसनं) शीलय (परिधेहि) ॥४॥ अनुवाद—सखि! चलो, कुंजकी ओर चलें। चलनेमें मुखरित होने वाले, विलास केलिमें अति चंचल होनेवाले इन नूपुरोंको तुम शत्रुके समान त्याग दो, तिमिर युक्त नीलवसनको धारण कर लो। पद्यानुवाद— त्याग मुखर नूपुर सखि! सत्वर साड़ी नीले रंगकी। पहिन, चलें इस तिमिर पुंजमें कुंज-ओर, क्यों ठिठकी? बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे राधे! इस समय अंधकार है जो अभिसारके लिए उचित समय है। इस अंधकारमें अभिसारिकाएँ अपने प्रेमियोंसे मिला करती हैं। अतः तुम इस अंधकारमें उस निभृत कुंजकी ओर चलो। सखि, इन नूपुरोंको उतार दो, ये तो तुम्हारे शत्रु ही हैं। अति चंचल होनेके कारण ये चलनेके समय तथा विलास-केलिमें ध्वनि उत्पन्न करते हैं, शत्रुके समान अवसरको जाने बिना ही मुखरित हो जाते हैं! ये मंजीर अभीष्ट सिद्धिके प्रतिकूल हैं। अब अपना नील वसन पहन लो। इस अभिसरणीय नील वसनके अवगुण्ठनसे तुम्हारा गौर वर्ण इस तिमिरमें एकाकार हो जायेगा, श्याममय हो जायेगा, तुम्हारे पथका अन्धकार और भी बढ़ जायेगा। उरसि मुरारेरुपहित-हारे घन इव तरल-बलाके। तड़िदिव पीते! रति-विपरीते राजसि सुकृत-विपाके॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥५॥