गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९५ अन्वय—अयि पीते (गौराङ्गि) सुकृतविपाके (सुकृतानां पुण्यानां विपाके फलस्वरूपे) रति विपरीते (विपरीतरतौ) उपहितहारे (आन्दालित-हारे) मुरारेः (कृष्णस्य) उरसि (वक्षसि) तरल-वलाके तरला चञ्चला वलाका वकपङ्क्तिः यस्मिन् तादृशे) घने (मेघे) तड़ित् (सौदामिनी) इव राजसि (वर्त्तमान- सामीप्ये लट् शोभिष्यसे) [अत्र उरसो घनेन, हारस्य वलाकया, गौर्यास्तड़िता सह साम्यमवगन्तव्यम्] ॥५॥ अनुवाद—हे विद्युतके समान पीतवर्णमयी राधे ! अपने कृतपुण्यके परिणामस्वरूप विपरीत रतिमें श्रीकृष्णके मणिमय हारसे सुशोभित वक्षःस्थलके ऊपर ऐसे सुशोभित होओगी, जैसे मेघके ऊपर चंचल बक-पंक्ति प्रकाशित हो रही है। पद्यानुवाद— रति-विपरीते, पीते ! राजित घन पर बिज्जु शलाका। हरि-उर-उपहित मौक्तिक माला, होगी तरल बलाका ॥ विगलित-वसनं परिहृत-रसनं घटय जघनमपिधानं। किशलय-शयने पङ्कज-नयने निधिमिव हर्ष-निधानं ॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥६॥ अन्वय—[अतो गत्वा] हे पङ्कज-नयने (सरोजाक्षि) किशलय-शयने (वालपल्लवशय्यायां) विगलित-वसनं (श्रीकृष्णेन हेतुना विगलितं वसनं यस्मात् तादृशं) परिहृत-वसनं (तेनैव परिहृता दूरीकृता रसना काञ्ची यस्मात् तादृशं) [अतएव] अपिधानं (नास्ति पिधानम् आच्छादनं यस्य तत् आवरणरहितमित्यर्थः) जघनं (कटिपुरोभागं) [तस्यैव] निधिमिव (रत्नमिव) हर्षनिधानं (आनन्दनिकेतनं) घटय (कुरु) [गतावरणस्य निधेर्दर्शने हर्षो जायत एवेत्यर्थः] ॥६॥ अनुवाद—हे इन्दीवरनयन राधे ! नवीन किसलयकी शय्या पर तुम आवरणरहित होकर, करधनी रहित होकर प्रियतमके प्रीतिविधान स्वरूप अपने निधि-रत्न जंघाओंको स्थापित कर दो।