भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९३ पतति पतत्रे विचलति पत्रे शङ्कित-भवदुपयानम्। रचयति शयनं सचकित-नयनं पश्यति तव पन्थानम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे...॥३॥ अन्वय—पतत्रे (विहङ्गमे) [वृक्षात् भूमौ] पतति (अवतरति सति) [तथा] पत्रे विचलति [सति] शङ्कित-भवदुपयानं (शङ्कितम् अनुमितं भवत्याः उपयानं आगमनं यस्मिन् तद् यथा तथा) शयनं (शय्यां) रचयति (निर्मिमीते) [तथा] सचकित-नयनं [यथा स्यात् तथा] तव पन्थानं (आगमनवर्त्म) पश्यति॥३॥ अनुवाद—राधे! श्रीकृष्ण अति उल्लास और अतिशय स्फूर्त्तिसे शय्याका निर्माण कर रहे हैं और जैसे ही किसी पक्षीके वृक्ष पर बैठनेसे पत्ते चंचल होकर थोड़ा-सा भी शब्द करने लगते हैं, तो वे तुम्हारे आगमनके मार्गका चकित दृष्टिसे अवलोकन करने लगते हैं। पद्यानुवाद— पक्षीके उड़नेसे तरुके पत्ते जब हिल जाते आती हो यह जान हृदयमें शंकासे खिल जाते। शीघ्र वहीं पर किसलय-दलकी शय्या ललित रचाते और पंथ पर चौंक-चौंक कर आँखें सजल बिछाते॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है कि वृक्षके पत्ते गिरनेसे या वायुके संचालनसे अथवा पक्षियोंके इधर-उधर घूमने-फिरनेसे सामान्य 'मर्मर' शब्द होते ही वे मनमें शंका करते हैं—कहीं श्रीराधा तो नहीं आ रही हैं। अतः बड़े ही उल्लाससे वे जल्दी ही शय्या-निर्माण करनेमें लग जाते हैं और चकित दृष्टिसे तुम्हारे आगमन-पथकी ओर देखने लगते हैं। मुखरमधीरं त्यज मञ्जीरं रिपुमिव केलिषु लोलम्। चल सखि! कुञ्जं सतिमिर-पुञ्जं शीलय नील-निचोलम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे...॥४॥