गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ श्रीगीतगोविन्दम् नाम-समेतं कृत-सङ्केतं वादयते मृदुवेणुम्। बहु मनुतेऽतनु ते तनु-सङ्गतपवन-चलितमपि रेणुम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥२॥ अन्वय—नाम-समेतं (नाम्ना समेतं यथास्यादेवं) कृतसङ्केतं (कृतं सङ्केतः इङ्गितं यथा स्यात् तथा; अहमिह तिष्ठामि त्वमप्यत्रागच्छति नाम-समेत-कृतसङ्केतार्थः इति सर्वाङ्गसुन्दरी) मृदु (कोमलं यथा भवेदेवं) वेणुं वादयते; [किञ्च] ते (तव) तनुसङ्गत-पवन-चलितमपि (तनु-सङ्गतेन गात्रस्पृष्टेन पवनेन चलिमपि) रेणुं (रजः) ननु (निश्चये) बहु मनुते (अधिकं मन्यते) [धन्योऽयं रेणुः यतस्तस्याः शरीरस्पृष्ट-वायोः स्पर्शसुखमन्वभूत्, ममेदृशं भाग्यं नास्तीति बहुमानार्थः]॥२॥ अनुवाद—हे राधे ! तुम्हारे नामका सङ्केत करते हुए वे कोमल वेणु बजा रहे हैं। तुम्हारे शरीरको संप्रुक्त करके वायुके साथ आये हुए बहुत अधिक धूलि-कणोंके स्पर्शसे स्वयंको अति भाग्यशाली मानकर उनका सम्मान कर रहे हैं। पद्यानुवाद— नाम सहित सङ्केत ध्वनित कर-कोमल वेणु बजाते। तव तन चुम्बित पवन-रेणुसे डरको समुद सजाते॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीको स्पष्ट कर रही है कि यदि तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास न हो तो वहाँसे आती हुई श्रीकृष्णकी वंशीकी टेर सुन लो, तुम्हारा ही नाम लेकर वह तुम्हें मिलनका संकेत दे रही है। श्रीकृष्ण इसी प्रकारसे तुम्हें राह बता रहे हैं। यदि तुम्हें यह आशंका है कि वहाँ जाने पर प्रतारणा होगी, किसी अन्य रमणीके साथ उनका अभिसार होगा तो तुम्हारी शंका निर्मूल है क्योंकि बालूके उन कणोंको भी रत्न जानकर वे अति सम्मान कर रहे हैं जो तुम्हारे चरणोंके आघातसे हवाके साथ उनके पास पहुँचे हैं।