गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९१ अनुवाद—सुमन्द मलय मारुत सेवित यमुना तीरवर्ती निकुञ्जवनमें बैठकर वनमालाधारी (श्रीकृष्ण) गोपियोंके पयोधरमण्डलको निपीडित करनेमें चञ्चलशाली कर-युगलसे सुशोभित हो प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! रतिसुखके सारभूत सङ्केतस्थानमें मदनके समान मनोहरवेशको धारण किये हुए हृदयवल्लभ श्रीकृष्णके पास अभिसरण करो, अब विलम्ब मत करो। पद्यानुवाद— "रति-सुख-सारे गत अभिसारे, मदन मनोहर वेशम्।" न कर नितम्बिनि! गमन विलम्बन, अनुसर निज हृदयेशम् ॥ धीर समीरे यमुना-तीरे, राज रहे वनमाली। गोपी-पीन-पयोधर-मर्दन-चञ्चलकर-युगशाली ॥ बालबोधिनी—अब सखी श्रीकृष्णके पास अभिसरण करानेके लिए श्रीराधाको प्रोत्साहित करती हुई कहती है—हे नितम्बिनि! अर्थात् प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! चलनेमें तुम अब देर मत करो, कालका अतिक्रमण मत करो, श्रोणीभारसे तुम वैसे ही धीरे-धीरे मन्द-मन्द चलती हो। उनके पीछे-पीछे तुम उस सङ्केतस्थानमें त्वरित पहुँचो। इस सङ्केत-स्थलमें रतिजन्य सुखकी प्रधानता है। वहीं तुम्हारे हृदयेश, वनमाली श्रीकृष्ण मदन मनोहर वेश धारण किये हुए अभिसारगामी हो रहे हैं, उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी बाट जोह रहे हैं। सङ्केतस्थलका स्पष्ट निदर्शन हुआ है। यमुनाके तट पर वेतसीका वन है। हवा मन्द-मन्द चलते हुए कुछ-कुछ थिर-सी हो गयी है। यह मन्द समीरण रतिकालमें अति सुखदायी होता है, कानन तो अति निविड़-निर्जन है ही। श्रीकृष्णका वेश मदन-सेवाके अनुकूल है, अभिसारगामी हो रहे हैं। चाँदनी रातमें समयानुरूप वेषभूषा धारणकर अभिसरण करना अभिसार कहा जाता है। उस कुञ्ज-प्रदेशमें वनमालीके पास पहुँचनेमें अब किञ्चित् भी विलम्ब मत करो।