गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० श्रीगीतगोविन्दम् तुम्हारा वार्तालाप मन्त्र बन गया। तुम ही उस निकुञ्जकी देवता हो। मन्त्रजपके द्वारा तुम्हारे कुम्भके समान उन्नत उरोजोंका गाढ़ालिङ्गन रूपी अमृतको वे प्राप्त करना चाहते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, काव्यलिङ्ग अलङ्कार है। एकादश सन्दर्भः गीतम् ॥११॥ गुर्जरीरागेण एकतालीतालेन गीयते॥ अनुवाद—यह ग्यारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गया जाता है। रति-सुख-सारे गतमभिसारे मदन-मनोहरवेषम्। न कुरु नितम्बिनि! गमन-विलम्बनमनुसर तं हृदयेशम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपीपीनपयोधरमर्दनचञ्चलकरयुगशाली ॥१॥ध्रु. अन्वय—[अभिसाराय प्रार्थयते—अभिसारिका-लक्षणं यथा— “अभिसारयते कान्तं या मन्मथवशंवदा। स्वयं वाभिसरत्येषा धीरैरुक्ताऽभिसारिका॥” इति साहित्यदर्पणे।] हे नितम्बिनि (निविड़नितम्बवति) रतिसुख सारे (रतौ यत् सुखं तस्य सारः यत्र तादृशे) अभिसारे (सङ्केतस्थाने) गतं (प्राप्तमभिसृतमित्यर्थः) मदन-मनोहर-वेशं (मदनेन प्रेम्ना मनोहरो वेशो यस्य तादृशं) तं हृदयेशम् (प्राणवल्लभम्) अनुसर। गमनविलम्बनं न कुरु (गुरुनितम्बतया सहजगमन-वैलम्ब्यशङ्क्येदयुक्तम्); [त्वद्विरह- खिन्नस्य अनुसरणे विलम्बो न युक्तः]; वनमाली (श्रीकृष्णः) धीरसमीरे (धीरसमीराख्ये यद्वा धीरः मन्दः समीरः समीरणो यत्र तादृशे; अनेन सुखदत्वं निविड़त्वात् निर्जनत्वञ्चोक्तम्) यमुनातीरे वने वसति॥१॥