भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 448 में से

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत—पीताम्बरः ४१३ प्रस्तुत श्लोकमें सांगरूपकालंकार ही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है, स्वाधीनभर्तृका नायिका है। पाञ्चाली रीति एवं गीति है। भारती वृत्ति है। धीरोदात्त गुणोंसे युक्त उत्तम नायक है। पर्यङ्कीकृत—नाग—नायक—फणा—श्रेणी मणीनां गजे संक्रान्त—प्रतिबिम्ब—संकलनया विभ्रद्विभू—प्रक्रियाम्। पादोम्भोरुहधारि—वारिधि सुतामक्ष्णां दिदृक्षुः शतैः कायव्यूहमिवाचरन्नुपचितीभूतो हरिः पातु वः॥ अन्वय—[अथ श्रीराधायाः पूर्वोक्तभावदर्शनात् तृप्तोत्कण्ठा- वगुण्ठितः श्रीकृष्णे नेत्रबाहुल्यमिच्छन् श्रीनारायणस्य लक्ष्मीदर्शनं श्लाघितवान् इति स्मरन् कविः आशिषं प्रयुङ्क्ते]—पर्यङ्कीकृत- नागनायक-फणा-श्रेणी-मणीनां गणे (पर्यङ्कीकृतस्य नागनायकस्य शेषस्य फणाश्रेण्यां ये मणयः रत्नानि तेषां गणे समूहे) संक्रान्तप्रतिविम्ब संकलनया (संक्रान्तानां मिलितानां प्रतिबिम्बानां प्रतिकृतीनां संकलनया प्रसरणेन) विभुप्रक्रियां (सर्वव्यापिभावं) विभ्रत् (धारयन्) उपचितीभूतः (वृद्धिं प्राप्तः) पादाम्भोरुहधारि- वारिधिसुतां (चरणकमल-सेविनी या वारिधिसुता लक्ष्मीः तां) अक्ष्णां शतैः (नेत्रशतैः) दिदृक्षुः (द्रष्टुमिच्छुः) [अतएव] कायव्यूहमिव (शरीरसमूहमिव) आचरन् हरिः (युष्मान्) पातु (रक्षतु) ॥२॥ अनुवाद—जिस नाग-नायक शेषराजको जिन्होंने अपनी शय्या बना रखा है, उसकी असंख्य फनोंकी मणियोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे जिनका विभुत्व विस्तारको प्राप्त कर रहा है, श्रीलक्ष्मीजी सदैव जिनके चरण कमलोंका संवाहन करती हैं और जिन्हें वे सहस्र-सहस्र नेत्रोंसे देखना चाहती हैं, जो कायव्यूहकी भाँति अनेकों विग्रह-स्वरूपोंमें स्फीत हो रहे हैं, वे श्रीहरि आप सबकी रक्षा करें। त्वामप्राप्य मयि स्वयम्बरपरां क्षीरोद—तीरोदरे शंके सुन्दरि! कालकूटमपिवन्मूढ़ो मृडानीपतिः।

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