गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४१५ वामादेवी-सुत-श्रीजयदेवकस्य (वामादेवी जयदेवजननी तस्याः सुतस्य श्रीजयदेवकस्य) पराशरादिप्रिय-बन्धुकण्ठे (पराशरादीनां ये प्रियाः तन्मतज्ञाः तेषु अपि ये बन्धवः तन्मतसार- श्रीराधामाधवरहः-केलिज्ञानेन बन्धुत्वं प्राप्ताः तेषां कण्ठे) [भूषणवत्] [सर्वदा] श्रीगीतगोविन्दकवित्वं (श्रीगीतगोविन्दाख्यं काव्यं) अस्तु [अनेन अस्य प्रबन्धस्य सर्व-वेदेतिहास-पुराणादि- वेत्तॄणां सम्मत्या सर्वसारत्वं दुरूहत्वञ्च बोधितम्]॥ सर्गोऽयं समृद्धिदाख्य-सम्भोग-रसानन्दितः पीताम्बरः प्रियाधीनत्वेन तद्वर्ण- वसन-प्रियः श्रीकृष्णो यत्र स इति सुप्रीत-पीताम्बरो नाम द्वादशः ॥६॥ अनुवाद—श्रीभोजदेवसे उत्पन्न रामादेवीके पुत्र श्रीजयदेव कवि द्वारा प्रस्तुत इस प्रबन्ध काव्य श्रीगीतगोविन्दका काव्यत्व पराशर आदि प्रिय बन्धुओंके कण्ठमें सुशोभित हो। बालबोधिनी—श्रीभोजदेव और श्रीरामादेवी (श्रीराधादेवी) के पुत्र श्रीजयदेवने भगवान्के प्रिय भक्तों पराशर आदि प्रिय मित्रोंके कण्ठमें मुखरित विभूषित होनेके लिए और प्रखरित होकर गगनमें अनुगूंजित होनेके लिए इस पदावलीकी रचना की है। रसरूप श्रीकृष्णके स्मरणमें अनोखे लीला-चित्र भक्त हृदयोंमें सदैव सुशोभित होते रहें, प्रिय-प्रियतर-प्रियतम-प्राण सर्वस्व बन जावें। समाप्तोऽयं ग्रन्थः