भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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१८ * गीता-संग्रह *


अनुद्विग्न, भय, क्रोध और रागसे रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है ॥ ५४ ॥

यथायं कमठोऽङ्गानि सङ्कोचयति सर्वतः।
विषयेभ्यस्तथा खानि सङ्कर्षेद्योगतत्परः ॥ ५५ ॥
जिस प्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंगोंको सिकोड़ लेता है, इसी प्रकारसे योगीको उचित है कि वह विषयोंसे इन्द्रियोंको समेट ले ॥ ५५ ॥

व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्य वर्ष्मिणः।
विना रागं न रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति ॥ ५६ ॥
भोजन त्यागनेवाले साधकके विषय तो नष्ट हो जाते हैं, परंतु उनका अनुभव बना रहता है। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे वह राग भी नष्ट हो जाता है ॥ ५६ ॥

विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः।
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरन्ति बलतो मनः ॥ ५७ ॥
हे राजन्! इन्द्रियगण मोक्षके लिये प्रयत्न करनेवाले विद्वान् पुरुषका भी मन बलात् हर लेती हैं। इस कारण बुद्धिमान् पुरुषको इन्द्रियोंको वशमें करनेका यत्न करना चाहिये ॥ ५७ ॥

युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत्।
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ॥ ५८ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करके योगीको सदा मेरे परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो गयी हैं, उसीको स्थितप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥

चिन्तयानस्य विषयान् सङ्गस्तेषूपजायते।
कामः सञ्जायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्धते ॥ ५९ ॥
विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उनमें अनुराग हो जाता है, आसक्ति (अनुराग)-से कामना होती है और उससे क्रोधकी उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥