गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
१८ * गीता-संग्रह *
अनुद्विग्न, भय, क्रोध और रागसे रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है ॥ ५४ ॥
यथायं कमठोऽङ्गानि सङ्कोचयति सर्वतः।
विषयेभ्यस्तथा खानि सङ्कर्षेद्योगतत्परः ॥ ५५ ॥
जिस प्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंगोंको सिकोड़ लेता है, इसी प्रकारसे योगीको उचित है कि वह विषयोंसे इन्द्रियोंको समेट ले ॥ ५५ ॥
व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्य वर्ष्मिणः।
विना रागं न रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति ॥ ५६ ॥
भोजन त्यागनेवाले साधकके विषय तो नष्ट हो जाते हैं, परंतु उनका अनुभव बना रहता है। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे वह राग भी नष्ट हो जाता है ॥ ५६ ॥
विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः।
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरन्ति बलतो मनः ॥ ५७ ॥
हे राजन्! इन्द्रियगण मोक्षके लिये प्रयत्न करनेवाले विद्वान् पुरुषका भी मन बलात् हर लेती हैं। इस कारण बुद्धिमान् पुरुषको इन्द्रियोंको वशमें करनेका यत्न करना चाहिये ॥ ५७ ॥
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत्।
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ॥ ५८ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करके योगीको सदा मेरे परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो गयी हैं, उसीको स्थितप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥
चिन्तयानस्य विषयान् सङ्गस्तेषूपजायते।
कामः सञ्जायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्धते ॥ ५९ ॥
विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उनमें अनुराग हो जाता है, आसक्ति (अनुराग)-से कामना होती है और उससे क्रोधकी उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥
* गणेशगीता * १९
क्रोधादज्ञानसम्भूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः।
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति॥६०॥
क्रोधसे अज्ञानकी उत्पत्ति और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होनेसे वह प्राणी भी नष्ट हो जाता है॥६०॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान् यस्तु खैश्चरेत्।
स्वाधीनहृदयो वश्यैः सन्तोषं स समृच्छति॥६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आयी इन्द्रियोंसे विषयोंका भोग करके भी चित्तको अपने वशमें रखनेवाले महापुरुष सन्तोष और शान्तिको प्राप्त होते हैं॥६१॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य सन्तोषे विलयो भवेत्।
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत्॥६२॥
सन्तोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार स्थिरप्रज्ञावाले योगीका मन प्रसन्न रहता है॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना।
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम्॥६३॥
हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती और बुद्धिके बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धाके बिना शान्ति नहीं होती और शान्तिके बिना सुख नहीं होता॥६३॥
इन्द्रियाश्वान् विचरतो विषयाननुवर्तते।
यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥
पवन जिस प्रकार नावको जलमें डुबो देता है, वैसे ही जो मन विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ोंके पीछे भागता है, वह प्रज्ञाको हर लेता है॥६४॥
२० * गीता-संग्रह *
या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः।
न स्वपन्तीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप॥ ६५॥
हे राजन्! अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्मज्ञान रात्रिस्वरूप है, उसमें इन्द्रियको वशमें करनेवाले संयमी योगी जागते हैं और जिस विषयबुद्धिमें सम्पूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषयभोग ज्ञानियोंके लिये रात्रिस्वरूप है॥ ६५॥
सरितां पतिमायान्ति वनानि सर्वतो यथा।
अयान्ति यं तथा कामा न स शान्तिं क्वचिल्लभेतू॥ ६६॥
जिस प्रकारसे [नदियों आदिके] सभी जल समुद्रमें प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसी प्रकार सब कामना पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती॥ ६६॥
अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः।
स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावन्ति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा॥ ६७॥
इस कारण प्राणीको उचित है कि सब प्रकारसे विषयोंकी ओर दौड़ती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है॥ ६७॥
ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान् कामांश्च यस्त्यजेत्।
नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥ ६८॥
जो ममत्व, अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करता है, नित्य ज्ञानमें मग्न रहता है, वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त हो जाता है॥ ६८॥
एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः।
तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति॥ ६९॥
हे राजन्! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है॥ ६९॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां सांख्यसारार्थयोगो नाम
प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
* गणेशगीता * २१
दूसरा अध्याय
कर्मयोग
वरेण्य उवाच
ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो। अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम्॥ १॥ वरेण्यने कहा—हे भगवन्! आपने ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनोंका वर्णन किया, आप दोनोंमेंसे एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो, उसे कहिये॥ १॥
गजानन उवाच
अस्मिंश्चराचरे स्थित्यौ पुरोक्ते द्वे मया प्रिय। सांख्यानां बुद्धियोगेन वैधयोगेन कर्मणाम्॥ २॥ श्रीगजानन बोले—हे प्रिय! इस चराचर जगत्में मेरे द्वारा पहले वर्णित दो प्रकारकी स्थिति है, सांख्यशास्त्र जाननेवालोंकी ज्ञानयोगसे और कर्मके अधिकारीजनोंकी कर्मयोगसे शुद्धि होती है॥ २॥
अनारम्भेण वैधानां निष्क्रियः पुरुषो भवेत्। न सिद्धिं याति सन्न्यागात्केवलात्कर्मणो नृप॥ ३॥ कर्ममें आसक्तजन कर्मोंके आरम्भ न करनेसे निष्क्रिय हो जाते हैं। हे राजन्! केवल कर्मोंके ही त्याग देनेसे सिद्धि नहीं होती॥ ३॥
कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते। अस्वतन्त्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते॥ ४॥ किसी दशामें क्षणमात्र भी कर्म बिना किये कोई नहीं रह सकता है। प्रकृतिके स्वाभाविक तीनों गुण सबको ही अवश्य करके कर्म कराते हैं॥ ४॥
कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन् पुमान्। तद्गोचरान् मन्दचित्तो धिगाचारः स भाष्यते॥ ५॥ जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको रोककर मन-ही-मनमें इन्द्रियोंके
२२ * गीता-संग्रह *
विषयोंका स्मरण करता है, उस इन्द्रियलोलुप दुरात्माको तुच्छ आचारवाला कहा जाता है॥५॥
तद् ग्रामं सन्नियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत्।
इन्द्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप॥६॥
हे राजन्! जो मनसे इन्द्रियोंका संयम करके कर्मेन्द्रियोंसे निष्काम कर्मयोगका अनुष्ठान करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है॥६॥
अकर्मणः श्रेष्ठतमं कर्मानीहाकृतं तु यत्।
वर्ष्मणः स्थितिरप्यस्याकर्मणो नैव सेत्स्यति॥७॥
कर्म न करनेसे तो फलकी कामना करके भी कर्म करना श्रेष्ठ है, कारण कि सब कर्मोंका त्याग करनेसे तो शरीरयात्रा भी नहीं हो सकती॥७॥
असमर्प्य निबध्यन्ते कर्म तेन जना मयि।
कुर्वीत सततं कर्मनाशोऽसङ्गो मदर्पणम्॥८॥
जो प्राणी कर्मोंका फल मुझमें समर्पण नहीं करते, वे बन्धनमें पड़ते हैं, इस कारणसे निष्काम कर्मका अनुष्ठान करते हुए निरन्तर मुझे अर्पण करके कर्मबन्धनका नाश करना चाहिये॥८॥
मदर्थे यानि कर्माणि तानि बध्नन्ति न क्वचित्।
सवासनमिदं कर्म बध्नाति देहिनं बलात्॥९॥
जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं, वे कहीं और कभी बन्धनके कारण नहीं होते, किंतु जो वासनापूर्वक (फलासक्तिपूर्वक) किये गये कर्म हैं, वे ही बलात् प्राणीको बाँधते हैं॥९॥
वर्णान् सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान् पुरा प्रिय।
यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत्॥१०॥
पूर्वकालमें मैंने यज्ञरूप नित्यकर्मके ही साथ-साथ मनुष्योंके वर्णोंको रचकर कहा—हे मनुष्यो! तुम यज्ञसे वृद्धिको प्राप्त हो, यह
* गणेशगीता * २३
शिक्षा कल्पवृक्षके समान तुम्हारी इष्टसिद्धिको देनेवाली हो ॥ १० ॥
सुरांशचान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः। लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ॥ ११ ॥
तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको (वर्षा आदिसे) प्रसन्न करें, इस प्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हों ॥ ११ ॥
इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान् सुतर्पिताः। तैर्दत्तांस्ताननरस्तेभ्योऽदत्त्वा भुङ्क्ते स तस्करः ॥ १२ ॥
देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण करेंगे, उन देवताओंके दिये पदार्थोंसे उनकी आराधना किये बिना जो भोग भोगता है, वह चोर है ॥ १२ ॥
हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः। अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोः पचन्ति ये ॥ १३ ॥
जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्नका भोजन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होते हैं और जो अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पापका ही भोजन करते हैं ॥ १३ ॥
ऊर्जो भवन्ति भूतानि देवादन्नस्य सम्भवः। यज्ञाच्च देवसम्भूतिस्तदुत्पत्तिश्च वैधतः ॥ १४ ॥
अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती है और कर्मसे यज्ञकी उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥
ब्रह्मणो वैधमुत्पन्नं मत्तो ब्रह्मसमुद्भवः। अतो यज्ञे च विश्वस्मिन् स्थितं मां विद्धि भूमिप ॥ १५ ॥
कर्म ब्रह्मासे उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे उत्पन्न होते हैं— इस कारण हे राजन्! आप इस यज्ञमें और विश्वमें स्थित मुझे ही जानिये ॥ १५ ॥
२४ * गीता-संग्रह *
संसृतीनां महाचक्रं क्रामितव्यं विचक्षणैः ।
स मुदा प्रीणते भूपेन्द्रियक्रीडोऽधमो जनः ॥ १६ ॥
इस आवागमनरूपी संसारचक्रसे बुद्धिमानोंको पार जाना उचित है, हे राजन्! जो अधम प्राणी है, वह इसमें इन्द्रियोंकी क्रीडासे सुख मानता है ॥ १६ ॥
अन्तरात्मनि यः प्रीत आत्मारामोऽखिलप्रियः ।
आत्मतृप्तो नरो यः स्यात्तस्यार्थो नैव विद्यते ॥ १७ ॥
जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाला है, वही आत्माराम और सबका प्यारा है, जो प्राणी आत्मतृप्त है, उसे किसी बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥
कार्याकार्यकृतीनां स नैवाप्नोति शुभाशुभे ।
किञ्चिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजन्तुषु सर्वदा ॥ १८ ॥
इस प्रकारका प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ-अशुभ फलको नहीं प्राप्त होता तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें इसका कभी कुछ साध्य नहीं होता ॥ १८ ॥
अतोऽसक्ततया भूप कर्तव्यं कर्म जन्तुभिः ।
सक्तोऽगतिमवाप्नोति मामवाप्नोति तादृशः ॥ १९ ॥
इस कारण, हे राजन्! प्राणियोंको आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है, जो आसक्त होता है, उसकी दुर्गति होती है और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाता है ॥ १९ ॥
परमां सिद्धिमापन्नाः पुरा राजर्षयो द्विजाः ।
सङ्ग्रहाय हि लोकानां तादृशं कर्म चारभेत् ॥ २० ॥
[हे राजन्!] प्राचीन कालमें कर्म करनेसे बहुतसे राजर्षि और ब्रह्मर्षि परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। लोकसंग्रहके निमित्त ही अनासक्त होकर कर्म करना उचित है ॥ २० ॥
* गणेशगीता * २५
श्रेयान् यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः।
मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥ २१ ॥
जो कर्म महान् पुरुष करते हैं, वही कर्म अन्य सब करते हैं, वह जिसको प्रमाण मानते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं॥ २१॥
विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप।
अनालब्धश्च लब्धव्यः कुर्वे कर्म तथाप्यहम् ॥ २२ ॥
हे राजन्! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें भी दुर्लभ नहीं है और मैं कर्म करके किसी अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेकी भी इच्छा नहीं करता हूँ, फिर भी मैं कर्म करता हूँ॥ २२॥
न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभावितः।
करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते ॥ २३ ॥
और हे महामते! यदि मैं आलसी तथा स्वच्छन्द होकर कर्म न करूँ तो सभी वर्ण कर्म छोड़कर केवल मेरा अनुगमन करने लगेंगे॥ २३॥
भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः सम्प्रदायिनः।
हन्ता स्यामस्य लोकस्य विधाता सङ्करस्य च ॥ २४ ॥
तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण आचारभ्रष्ट होकर नष्ट हो जायँगे। इससे इस संसारका नाश करनेवाला और वर्णसंकरको उत्पन्न करनेवाला भी मैं ही होऊँगा॥ २४॥
कामिनो हि सदा कामैरज्ञानात्कर्मकारिणः।
लोकानां सङ्ग्रहायैतद्विद्वान् कुर्यादसक्तधीः ॥ २५ ॥
जिस प्रकारसे कामनावाले अज्ञानसे सदा कर्म करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान्को उचित है कि लोकसंग्रहके निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म करता रहे॥ २५॥
२६ * गीता-संग्रह *
विभिन्नत्वमतिं जह्यादज्ञानां कर्मचारिणाम्।
योगयुक्तः सर्वकर्माण्यर्पयेन्मयि कर्मकृत् ॥ २६ ॥
अज्ञानसे कर्म करनेवालोंकी भेदबुद्धिका त्याग करे तथा योगयुक्त होकर कर्म करता हुआ वे सब कर्म मुझे अर्पण कर दे ॥ २६ ॥
अविद्यागुणसाचिव्यात्कुर्वन् कर्माण्यतन्द्रितः।
अहङ्काराद्भिन्नबुद्धिरहं कर्तेति योऽब्रवीत् ॥ २७ ॥
[हे राजन्!] अविद्या और गुणोंके वशीभूत हुआ निरन्तर कर्म करनेमें लगा हुआ व्यक्ति अहंकारसे मूढ़ होकर अपनेको कर्ता बताता है ॥ २७ ॥
यस्तु वेत्त्यात्मनस्तत्त्वं विभागाद्गुणकर्मणोः।
करणं विषये वृत्तमिति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥
जो कोई आत्मज्ञ सत्त्वादि गुण तथा उनके कर्मोंके विभागको इस प्रकार जानते हैं कि इन्द्रियाँ अपने विषयोंमें वर्तमान हैं तो वे ऐसा जानकर कर्ममें लिप्त नहीं होते ॥ २८ ॥
कुर्वन्ति सफलं कर्म गुणैस्त्रिभिर्विमोहिताः।
अविश्वस्तः स्वात्मद्रुहो विश्वविन्नैव लङ्घयेत् ॥ २९ ॥
सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी फलकी इच्छासे कर्म करते हैं, उन अविश्वासी और आत्मद्रोहियोंको सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे ॥ २९ ॥
नित्यं नैमित्तिकं तस्मान्मयि कर्मार्पयेद्बुधः।
त्यक्त्वाहं ममताबुद्धिं परां गतिमवाप्नुयात् ॥ ३० ॥
इस प्रकार पण्डितको उचित है कि मुझमें ही नित्य-नैमित्तिक कर्मको अर्पण कर दे तो वह अहं और ममता बुद्धिका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जायगा ॥ ३० ॥
- गणेशगीता * २७
अनीर्ष्यन्तो भक्तिमन्तो ये मयोक्तमिदं शुभम्।
अनुतिष्ठन्ति ये सर्वे मुक्तास्तेऽखिलकर्मभिः॥ ३१॥
ईर्ष्या न करनेवाले जो भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ मार्गका अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ३१॥
ये चैव नानुतिष्ठन्ति त्वशुभा हतचेतसः।
ईर्ष्यमाणान् महामूढान्नष्टांस्तान् विद्धि मे रिपून्॥ ३२॥
जो अज्ञानसे चित्तके नष्ट होनेके कारण इस मार्गका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन ईर्ष्यालु, मूर्ख और नष्टबुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो॥ ३२॥
तुल्यं प्रकृत्या कुरुते कर्म यज्ज्ञानवानपि।
अनुयाति च तामेवाग्रहस्तत्र मुधा मतः॥ ३३॥
जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार चेष्टा करता है और उसी स्वभावका अनुगमन करता है तो स्वभावको ग्रहण न करना व्यर्थ है॥ ३३॥
कामश्चैव तथा क्रोधः खानामर्थेषु जायते।
नैतयोर्वश्यतां यायादस्य विध्वंसकौ यतः॥ ३४॥
कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियके विषयोंमें काम और क्रोध उत्पन्न होते हैं, इनके वशमें नहीं होना चाहिये, कारण कि यही प्राणीके शत्रुरूप हैं॥ ३४॥
शस्तोऽगुणो निजो धर्मः साङ्गादन्यस्य धर्मतः।
निजे तस्मिन् मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः॥ ३५॥
अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरेका धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भी परलोकमें कल्याणकारी है, परंतु दूसरेका श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है॥ ३५॥
२८ * गीता-संग्रह *
वरेण्य उवाच
पुमान् यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते।
अकाङ्क्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥
वरेण्यने कहा—हे गणेशजी ! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं करता हुआ भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है ? ॥ ३६ ॥
श्रीगजानन उवाच
कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ।
नयन्तौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ॥ ३७ ॥
श्रीगणेशजी बोले—रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्हीं दोनोंको तुम महान् शत्रु जानो ॥ ३७ ॥
आवृणोति यथा माया जगद्वाष्पो जलं यथा।
वर्षामेघो यथा भानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार माया जगत्को ढकती है, जैसे भाप जलको और जैसे वर्षाकालका मेघ सूर्यको ढक लेता है, इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥
प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा।
इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ॥ ३९ ॥
महाबली, सदैव द्वेष करनेवाले और कभी पूरा न हो सकनेवाले इस इच्छारूप कामने ही बुद्धिमानोंके ज्ञानको भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥
आश्रित्य बुद्धिमणसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति।
तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥ ४० ॥
यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंके आश्रित होकर रहता है, उन्हींसे ज्ञानको आच्छादित करके यह ज्ञानियोंको भी मोहित करता है ॥ ४० ॥
* गणेशगीता * २९
तस्मान्नियम्य तान्यादौ स मनांसि नरो जयेत्।
ज्ञानविज्ञानयोः शान्तिकरं पापं मनोभवम्॥ ४१ ॥
अतः पहले मनके सहित इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाश करनेवाले इस मनोद्भव पापी कामको जीतना चाहिये॥ ४१ ॥
यतस्तानि पराण्याहुस्तेभ्यश्च परं मनः।
ततोऽपि हि परा बुद्धिरात्मा बुद्धेः परो मतः॥ ४२ ॥
स्थूल देहसे इन्द्रियाँ परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धिसे परे आत्मा है॥ ४२ ॥
बुद्ध्वैवमात्मनात्मानं संस्तभ्यात्मानमात्मना।
हत्वा शत्रुं कामरूपं परं पदमवाप्नुयात्॥ ४३ ॥
इस प्रकार बुद्धिसे आत्माको जानकर, बुद्धिसे ही मनको स्थिर करके कामरूपी शत्रुको मारकर परम पदको प्राप्त करना चाहिये॥ ४३ ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां कर्मयोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
ज्ञानयोग
श्रीगजानन उवाच
पुरा सर्गादिसमये त्रैगुण्यं त्रितनूरुहम्।
निर्माय चैनमवदं विष्णवे योगमुत्तमम्॥ १ ॥
**श्रीगणेशजी बोले—**पूर्वकालमें सृष्टि उत्पन्न करनेके समय तीन गुणोंसे युक्त तीन शरीरमें रहनेवाले उत्तम योगका निर्माण करके मैंने विष्णुसे इसका वर्णन किया था॥ १ ॥
अर्यम्णे सोऽब्रवीत्सोऽपि मनवे निजसूनवे।
ततः परम्परायातं विदुरेनं महर्षयः॥ २ ॥
विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा। सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे
३० * गीता-संग्रह *
कहा। इसके उपरान्त परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षिगण जानते रहे ॥ २ ॥
कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे। अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥ ३ ॥
हे राजन्! कलियुगमें यह बहुत काल बीत जानेसे नष्ट हो गया तथा इसे श्रद्धा-विश्वासके अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया ॥ ३ ॥
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात्। गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥
अब फिर तुमने मेरे मुखसे इस पुरातन योगको सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच
साम्प्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन। प्रोक्तवान् कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ ५ ॥
राजा वरेण्य बोले—हे गजानन! आप तो इस समय गर्भसे उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णुसे यह उत्तम योग किस प्रकारसे वर्णन किया ? ॥ ५ ॥
गणेश उवाच
अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च। संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥ ६ ॥
गणेशजी बोले—[हे राजन्!] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते ॥ ६ ॥
मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः। मय्येव लयं यान्ति प्रलयेषु युगे युगे ॥ ७ ॥
हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ७ ॥
* गणेशगीता * ३१
अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च।
अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ ८॥
मैं ही श्रेष्ठ ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ॥ ८॥
अजोऽव्ययोऽहं भूतात्मानादिरीश्वर एव च।
आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु॥ ९॥
मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ॥ ९॥
अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत्।
साधून् संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम्॥ १०॥
जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ॥ १०॥
उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च।
हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा॥ ११॥
मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका स्थापन करता हूँ और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनन्दसे दुष्टों तथा दैत्योंका वध करता हूँ॥ ११॥
वर्णाश्रमान् मुनीन् साधून् पालये बहुरूपधृक्।
एवं यो वेत्ति सम्भूतिर्मम दिव्या युगे युगे॥ १२॥
तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः।
त्यक्त्वाहं ममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते॥ १३॥
अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओंका पालन करता हूँ, इस प्रकारसे जो युग-युगमें मेरी दिव्य विभूतिको, मेरे कर्म, वीर्य और रूपको जानता है तथा अहंकार और ममताबुद्धिका त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है॥ १२-१३॥
३२ * गीता-संग्रह *
निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्व्यपाश्रयाः। विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः॥१४॥
इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करनेवाले विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक प्राणी मुझको प्राप्त हो गये हैं॥१४॥
येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः। तथा तथा फलं तेभ्यः प्रयच्छाम्यव्ययः स्फुटम्॥१५॥
श्रेष्ठजन जिस-जिस भावसे मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनश्वर उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ॥१५॥
जनाः स्युरितरे राजन् मम मार्गानुयायिनः। तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते॥१६॥
हे राजन्! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं॥१६॥
कुर्वन्ति देवताप्रीतिं काङ्क्षन्तः कर्मणां फलम्। प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम्॥१७॥
जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है॥१७॥
चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोऽशतः। कर्माशितश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयानघ॥१८॥
हे पापरहित! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व, रज, तम—इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है॥१८॥
कर्तारमपि तेषां मामकर्तारं विदुर्बुधाः। अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः॥१९॥
यद्यपि मैं इनका कर्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते
- गणेशगीता * ३३
हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं ॥ १९ ॥
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम्।
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वं पूर्वं मुमुक्षवः ॥ २० ॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्वमें मुमुक्षुजन कर्म करते थे ॥ २० ॥
वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ।
अज्ञानबन्धनाजन्तुर्बुद्ध्वाय मुच्यतेऽखिलात् ॥ २१ ॥
वासना जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव।
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥ २२ ॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जाननेमें बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोहको प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥
तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम्।
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिः प्रिय ॥ २३ ॥
हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्मका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥
क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः।
यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ २४ ॥
क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥
३४ * गीता-संग्रह *
कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यारहभेन्नरः।
तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम्॥ २५॥
जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं॥ २५॥
फलतृष्णां विहाय स्यात्सदा तृप्तो विसाधनः।
उद्युक्तोऽपि क्रियां कर्तुं किञ्चिन्नैव करोति सः॥ २६॥
जो फलकी इच्छाको छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करनेमें लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं॥ २६॥
निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः।
केवलं वै गृहं कर्माचरन्नायाति पातकम्॥ २७॥
जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता॥ २७॥
अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्च यः।
यथा प्राप्येऽहं सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते॥ २८॥
जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते॥ २८॥
अखिलैर्विषयैर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानवानपि।
यज्ञार्थं तस्य सकलं कृतं कर्म विलीयते॥ २९॥
सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणीके सारे कर्म यज्ञ ही हैं और उसकी सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं॥ २९॥
- गणेशगीता * ३५
अहमग्निर्हविर्होता हुतं यन्मयि चार्पितम्।
ब्रह्माप्तव्यं च तेनाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः॥ ३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाले और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है वह, सब मैं ही हूँ। इसे ब्रह्मस्वरूपसे देखकर जो हवन करता है, वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही लगा है॥ ३०॥
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदन्ति च।
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे॥ ३१॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं॥ ३१॥
संयमाग्नौ परे भूप इन्द्रियाण्युपजुह्वति।
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥ ३२॥
हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं॥ ३२॥
प्राणानामिन्द्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः।
निजामरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति॥ ३३॥
कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं॥ ३३॥
द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन।
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजन्ति माम्॥ ३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं॥ ३४॥
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपन्ति ये।
रुद्धा गतीश्चोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः॥ ३५॥
जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें
३६ * गीता-संग्रह *
हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३५ ॥
जित्वा प्राणान् प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च।
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥
नित्यं ब्रह्म प्रयान्त्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः।
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यः कुतो भवेत् ॥ ३७ ॥
दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकारके यज्ञोंमें निरत योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा? ॥ ३६-३७ ॥
कायिकादि त्रिधाभूतान् यज्ञान् वेदे प्रतिष्ठितान्।
ज्ञात्वा तानखिलान् भूप मोक्ष्यसेऽखिलबन्धनात् ॥ ३८ ॥
हे राजन्! वेदोंमें मन, वचन, कर्मके बहुत प्रकारके यज्ञ वर्णित हैं, उन्हें पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥
सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः।
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ ३९ ॥
हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥
तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम्।
शुश्रूषया वदिष्यन्ति सन्तस्तत्त्वविशारदाः ॥ ४० ॥
हे पुरुषश्रेष्ठ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन तुम्हें शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥
नानासङ्गाज्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम्।
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करता है, पर किसी साधुकी
- गणेशगीता * ३७
संगति नहीं करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
सत्सङ्गाद्गुणसम्भूतिरापदां लय एव च।
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणोंकी प्राप्ति और आपदाका नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥
इतरत्सुलभं राजन् सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥ ४३ ॥
हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है ॥ ४३ ॥
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवापि पश्यति।
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेपर यह सब प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। इससे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात्।
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात् ॥ ४५ ॥
जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप।
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥ ४६ ॥
हे राजन्! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्।
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ ४७ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको