भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ३५

अहमग्निर्हविर्होता हुतं यन्मयि चार्पितम्।
ब्रह्माप्तव्यं च तेनाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः॥ ३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाले और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है वह, सब मैं ही हूँ। इसे ब्रह्मस्वरूपसे देखकर जो हवन करता है, वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही लगा है॥ ३०॥

योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदन्ति च।
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे॥ ३१॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं॥ ३१॥

संयमाग्नौ परे भूप इन्द्रियाण्युपजुह्वति।
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥ ३२॥
हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं॥ ३२॥

प्राणानामिन्द्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः।
निजामरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति॥ ३३॥
कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं॥ ३३॥

द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन।
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजन्ति माम्॥ ३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं॥ ३४॥

प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपन्ति ये।
रुद्धा गतीश्चोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः॥ ३५॥
जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें