भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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३६ * गीता-संग्रह *


हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३५ ॥

जित्वा प्राणान् प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च।
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥

नित्यं ब्रह्म प्रयान्त्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः।
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यः कुतो भवेत् ॥ ३७ ॥

दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकारके यज्ञोंमें निरत योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा? ॥ ३६-३७ ॥

कायिकादि त्रिधाभूतान् यज्ञान् वेदे प्रतिष्ठितान्।
ज्ञात्वा तानखिलान् भूप मोक्ष्यसेऽखिलबन्धनात् ॥ ३८ ॥

हे राजन्! वेदोंमें मन, वचन, कर्मके बहुत प्रकारके यज्ञ वर्णित हैं, उन्हें पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥

सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः।
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ ३९ ॥

हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥

तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम्।
शुश्रूषया वदिष्यन्ति सन्तस्तत्त्वविशारदाः ॥ ४० ॥

हे पुरुषश्रेष्ठ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन तुम्हें शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥

नानासङ्गाज्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम्।
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥ ४१ ॥

जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करता है, पर किसी साधुकी