गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ३७
संगति नहीं करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
सत्सङ्गाद्गुणसम्भूतिरापदां लय एव च।
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणोंकी प्राप्ति और आपदाका नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥
इतरत्सुलभं राजन् सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥ ४३ ॥
हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है ॥ ४३ ॥
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवापि पश्यति।
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेपर यह सब प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। इससे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात्।
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात् ॥ ४५ ॥
जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप।
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥ ४६ ॥
हे राजन्! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्।
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ ४७ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको