गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः।
तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः॥ ४८ ॥
जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥
आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम्।
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न ॥ ४९ ॥
हे राजन्! जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सभी सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योगमें स्थित होकर जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ ४९ ॥
ज्ञानखड्गप्रहारेण सम्भूतामज्ञतां बलात्।
छित्त्वान्तःसंशयं तस्माद्योगयुक्तो भवेन्नरः॥ ५० ॥
इस कारण ज्ञानरूपी खड्गसे मनके अज्ञान तथा संशयको बलपूर्वक काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना उचित है ॥ ५० ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां ज्ञानयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
संन्यासयोग
वरेण्य उवाच
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया।
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥ १ ॥
वरेण्य बोले— हे भगवन्! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् निष्कामभावसे कर्म करते-करते विशुद्ध चित्त होनेपर कर्मत्याग करने)-को ज्ञानका