गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
- गणेशगीता * ३५
अहमग्निर्हविर्होता हुतं यन्मयि चार्पितम्।
ब्रह्माप्तव्यं च तेनाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः॥ ३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाले और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है वह, सब मैं ही हूँ। इसे ब्रह्मस्वरूपसे देखकर जो हवन करता है, वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही लगा है॥ ३०॥
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदन्ति च।
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे॥ ३१॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं॥ ३१॥
संयमाग्नौ परे भूप इन्द्रियाण्युपजुह्वति।
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥ ३२॥
हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं॥ ३२॥
प्राणानामिन्द्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः।
निजामरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति॥ ३३॥
कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं॥ ३३॥
द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन।
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजन्ति माम्॥ ३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं॥ ३४॥
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपन्ति ये।
रुद्धा गतीश्चोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः॥ ३५॥
जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें
३६ * गीता-संग्रह *
हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३५ ॥
जित्वा प्राणान् प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च।
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥
नित्यं ब्रह्म प्रयान्त्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः।
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यः कुतो भवेत् ॥ ३७ ॥
दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकारके यज्ञोंमें निरत योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा? ॥ ३६-३७ ॥
कायिकादि त्रिधाभूतान् यज्ञान् वेदे प्रतिष्ठितान्।
ज्ञात्वा तानखिलान् भूप मोक्ष्यसेऽखिलबन्धनात् ॥ ३८ ॥
हे राजन्! वेदोंमें मन, वचन, कर्मके बहुत प्रकारके यज्ञ वर्णित हैं, उन्हें पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥
सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः।
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ ३९ ॥
हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥
तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम्।
शुश्रूषया वदिष्यन्ति सन्तस्तत्त्वविशारदाः ॥ ४० ॥
हे पुरुषश्रेष्ठ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन तुम्हें शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥
नानासङ्गाज्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम्।
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करता है, पर किसी साधुकी
- गणेशगीता * ३७
संगति नहीं करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
सत्सङ्गाद्गुणसम्भूतिरापदां लय एव च।
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणोंकी प्राप्ति और आपदाका नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥
इतरत्सुलभं राजन् सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥ ४३ ॥
हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है ॥ ४३ ॥
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवापि पश्यति।
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेपर यह सब प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। इससे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात्।
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात् ॥ ४५ ॥
जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप।
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥ ४६ ॥
हे राजन्! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्।
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ ४७ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको
३८ * गीता-संग्रह *
प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः।
तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः॥ ४८ ॥
जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥
आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम्।
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न ॥ ४९ ॥
हे राजन्! जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सभी सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योगमें स्थित होकर जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ ४९ ॥
ज्ञानखड्गप्रहारेण सम्भूतामज्ञतां बलात्।
छित्त्वान्तःसंशयं तस्माद्योगयुक्तो भवेन्नरः॥ ५० ॥
इस कारण ज्ञानरूपी खड्गसे मनके अज्ञान तथा संशयको बलपूर्वक काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना उचित है ॥ ५० ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां ज्ञानयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
संन्यासयोग
वरेण्य उवाच
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया।
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥ १ ॥
वरेण्य बोले— हे भगवन्! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् निष्कामभावसे कर्म करते-करते विशुद्ध चित्त होनेपर कर्मत्याग करने)-को ज्ञानका
- गणेशगीता * ३९
कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहते हैं, इन दोनोंमें जो हितकारी हो, उसे कहिये ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने।
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीगणेशजी बोले—(अधिकारियोंके भेदसे) कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्मसंन्याससे कर्मयोगमें विशेषता है॥ २॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न काङ्क्षति किञ्चन।
मुच्यते बन्धनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान् सुखम् ॥ ३ ॥
जो द्वन्द्व और दुःखको सहकर किसीसे द्वेष नहीं करता और किसी बातकी इच्छा नहीं करता, ऐसा प्राणी अनायास तत्काल कर्मबन्धनसे सदा मुक्त हो जाता है॥ ३॥
वदन्ति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसङ्ग्रहौ।
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं सयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको मूढ़ और अज्ञानी ही पृथक्-पृथक् कहते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही मानते हैं॥ ४॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम्।
सङ्ग्रहं कर्मणो योगं यो विन्दति स विन्दति ॥ ५ ॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है॥ ५॥
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः।
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पण्डितजन केवल कर्मके संन्यासको ही संन्यास नहीं कहते, यदि
४० * गीता-संग्रह *
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्म ही हो जाता है॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः।
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन् कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, मनको वशमें करनेवाले, जितेन्द्रिय, योगमें तत्पर और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेवाले कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥७॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते।
एकादशानीन्द्रियाणि कुर्वन्ति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वको जाननेवाला योगयुक्त आत्मवान् पुरुष 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा नहीं मानता, अपितु मनसहित एकादश इन्द्रियाँ कर्म करती हैं, ऐसा मानता है ॥८॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः।
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥९॥
जो कर्म करनेवाला सारे कर्म ब्रह्ममें अर्पण कर देता है, वह उसी प्रकार पाप-पुण्यसे लिप्त नहीं होता, जैसे जलमें पड़ा हुआ सूर्यका बिम्ब उससे लिप्त नहीं होता ॥९॥
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा।
त्यक्त्वाशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये ॥१०॥
योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त आशा (फलाशा)-का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे कर्म करते हैं ॥१०॥
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम्।
बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते ॥११॥
योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है, वह कर्मबीजसे बँध जाता है और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥
- गणेशगीता * ४१
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत्।
न कुर्वन् कारयन् वापि नन्दञ्च्वभ्रे सुपत्तने ॥ १२ ॥
न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया।
न क्रियाबीजसम्पर्कः शक्त्या तत्क्रियतेऽखिलम् ॥ १३ ॥
कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप।
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
योगीको उचित है कि मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर सुखसे रहे तथा उत्तम नगरमें आनन्दसे वास करता हुआ भी न कुछ करे, न कराये और ऐसा जाने कि न कोई क्रिया करता हूँ, न कोई कर्तृत्वपना मुझमें है, न मैं कोई निर्माण करता हूँ, न मेरा क्रियाके बीजसे सम्बन्ध है, यह सब कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है। हे राजन्! मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं करता हूँ, मोहसे मलिन बुद्धिवाले अज्ञानी ही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १२-१४ ॥
विवेकेनात्मनोऽज्ञानं येषां नाशितमात्मना।
तेषां विकाशमायाति ज्ञानमादित्यवत्परम् ॥ १५ ॥
जिन्होंने विवेकके द्वारा स्वयं ही अपना अज्ञान नष्ट किया है, उनका ज्ञान सूर्यके समान परम प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
मन्निष्ठा मद्धियोऽत्यन्तं मच्चित्ता मयि तत्पराः।
अपुनर्भवमायान्ति विज्ञानान्नाशितैनसः ॥ १६ ॥
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझमें ही है, जिनका चित्त मुझमें अत्यन्त आसक्त है और जो सदा मेरे परायण हैं, वे श्रेष्ठ ज्ञानद्वारा पापका नाश करके मुक्त हो जाते हैं ॥ १६ ॥
ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु।
समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि ॥ १७ ॥
महात्मा पण्डितजन ज्ञानविज्ञानयुक्त ब्राह्मण, गौ, हाथी आदि
४२ * गीता-संग्रह *
प्राणी, चाण्डाल और श्वान—इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं॥ १७॥
वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः।
यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम्॥ १८॥
जिनका मन समतामें स्थित है, वे जीवन्मुक्त संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं, कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समतायुक्त है, इस कारण वे ब्रह्ममें स्थित रहते हैं॥ १८॥
प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न।
ब्रह्माश्रिता असम्मूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः॥ १९॥
जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक नहीं करते, वे समत्वबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन ब्रह्ममें स्थित तथा ब्रह्मके जाननेवाले हैं॥ १९॥
वरेण्य उवाच
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु।
भगवन् कृपया तन्मे वद विद्याविशारद॥ २०॥
वरेण्य बोले— भगवन्! तीनों लोकों तथा देवता और गन्धर्व आदि योनियोंमें यथार्थ सुख क्या है ? हे विद्याविशारद! कृपाकर आप मुझसे यह वर्णन कीजिये॥ २०॥
श्रीगजानन उवाच
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि।
अविनाशि सुखं तद्वि न सुखं विषयादिषु॥ २१॥
श्रीगणेशजी बोले— जो अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसीका नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें (वास्तविक) सुख नहीं है॥ २१॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः।
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित्॥ २२॥
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख तो दुःखके ही कारण हैं और उत्पत्ति
* गणेशगीता * | ४३
तथा नाशवाले हैं। तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२ ॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः।
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥ २३ ॥
काम, क्रोध आदिका कारण उपस्थित रहनेपर भी जो उनके आवेगको रोक लेता है तथा शरीरके प्रति अनासक्त होकर उन्हें जीतनेका प्रयत्न करता है, वह बहुत कालतक सुख भोगता है ॥ २३ ॥
अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽन्तःसुखोऽन्तार्तिर्लभैत् ।
असन्दिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ॥ २४ ॥
जिनके हृदयमें निष्ठा है, ज्ञानका प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियोंका हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥
जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा।
तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ २५ ॥
जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है ॥ २५ ॥
आसनेषु समासीनस्त्यक्त्वेमान् विषयान् बहिः।
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ॥ २६ ॥
सब बाह्य विषयोंका त्यागकर एकान्तमें आसनमें स्थित हो, दृष्टिको भ्रूमध्यमें स्थिरकर प्राणायाम करे ॥ २६ ॥
प्राणायामं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम्।
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभूतं विपश्चितः ॥ २७ ॥
प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियोंने उसके तीन भेद कहे हैं ॥ २७ ॥
४४ * गीता-संग्रह *
प्रमाणं भेदतो विद्धि लघुमध्यममुत्तमम्।
दशभिर्द्व्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघुः स्मृतः॥ २८ ॥
प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम—तीन प्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहलाता है॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः।
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो य उत्तमः सोऽभिधीयते॥ २९ ॥
चौबीस अक्षरोंका मध्यम और छत्तीस अक्षरोंका उत्तम कहा जाता है॥ २९ ॥
सिंहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा।
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत्॥ ३० ॥
सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुको साधना चाहिये॥ ३० ॥
पीडयन्ति मृगांस्ते न लोकान् वश्यंगतान्नृप।
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धो न च तत्तनुम्॥ ३१ ॥
हे राजन्! जिस प्रकार अपने वशमें हुए सिंहादि मृगोंको सताते हैं, किंतु वशमें करनेवाले लोगोंको पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थिर होकर पापोंको भस्म करता है, परंतु शरीरको नहीं जलाता॥ ३१ ॥
यथा यथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत्।
तथा तथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित्॥ ३२ ॥
जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य सीढ़ियोंपर चढ़ता है, इसी प्रकार योगीके लिये क्रमसे प्राणापानको वशमें करना उचित है॥ ३२ ॥
- गणेशगीता * ४५
पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत्।
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥ ३३ ॥
* पूरक-कुम्भक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाता है॥ ३३॥
प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता।
योगस्तु धारणे द्वे स्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ॥ ३४ ॥
बारह उत्तम प्राणायामसे उत्तम धारणा होती है, दो धारणासे योग सिद्ध होता है, योगी निरन्तर धारणाका अभ्यास करे॥ ३४॥
एवं यः कुरुते राजंस्त्रिकालज्ञः स जायते।
अनायासेन तस्य स्याद्वश्यं लोकत्रयं नृप॥ ३५ ॥
हे राजन्! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकालका ज्ञान हो जाता है और अनायास त्रिलोकी उनके वशमें हो जाती है॥ ३५॥
ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि।
एवं योगश्च संन्यासः समानफलदायिनौ ॥ ३६ ॥
वह अपने अन्तरात्मामें सब जगत्को ब्रह्मरूप देखता है। इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फलके देनेवाले हैं॥ ३६॥
जन्तूनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम्।
मां ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नोति त्रैलोक्यस्येश्वरं विभुम् ॥ ३७ ॥
सब प्राणियोंके हितकारी और कर्मका फल देनेवाले एवं त्रिलोकीके व्यापक मुझ ईश्वरको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं॥ ३७॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां वैधसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
* पूरक—वायुको ऊपर खींचना, कुम्भक—वायुका रोध करना, रेचक—वायुका त्याग करना—ये तीन प्राणायामके अंग हैं।
४६ * गीता-संग्रह *
पाँचवाँ अध्याय
योगवृत्तिकी प्रशंसा
श्रीगजानन उवाच
श्रौतस्मार्तानि कर्माणि फलं नेच्छन् समाचरेत्।
शस्तः स योगी राजेन्द्र अक्रियायोगमाश्रितात्॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! जो श्रुति और स्मृतिमें कहे हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके करता है, वह योगी कर्मका त्याग करनेवाले योगियोंसे श्रेष्ठ है॥ १॥
योगप्राप्त्यै महाबाहो हेतुः कर्मैव मे मतम्।
सिद्धियोगस्य संसिद्धयै हेतुः शमदमौ मतौ॥ २॥
हे महाभुज! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही कारण है, योगसिद्धिकी सिद्धिके निमित्त शम और दम ही कारण हैं॥ २॥
इन्द्रियार्थांश्च सङ्कल्प्य कुर्वन् स्वस्य रिपुर्भवेत्।
एताननिच्छन् यः कुर्वन् सिद्धिं योगी च सिद्ध्यति॥ ३॥
इन्द्रियोंके विषयोंका संकल्पकर कर्म करनेवाला अपना शत्रु होता है और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है, वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है॥ ३॥
सुहृत्त्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बन्धने।
आत्मनैवात्मनो ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन॥ ४॥
एकमात्र आत्मा ही आत्माका मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है और यही अज्ञान होनेसे बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं॥ ४॥
मानेऽपमाने दुःखे च सुखे सुहृदि साधुषु।
मित्रेऽमित्रेऽप्युदासीने द्वेष्ये लोष्ठे च काञ्चने॥ ५॥
* गणेशगीता * ४७
समो जितात्मा विज्ञानी ज्ञानीन्द्रियजयावहः।
अभ्यसेत्सततं योगं यदा युक्ततमो हि सः॥ ६॥
मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टीके ढेले और सुवर्ण इत्यादिमें समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा सदा योगका अभ्यास करता रहे, जबतक कि उसको योगकी सिद्धि न हो जाय ॥ ५-६ ॥
तप्तः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके।
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते।
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥
जो संतप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जलकी अधिकतावाले देशमें, जिस स्थानमें ध्वनि अधिक हो, जो टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी, दीवारके निकट तथा जहाँ शुष्क पर्णका शब्द सुनायी पड़ता हो, चैत्य वृक्षके नीचे, वल्मीक (बाँबी)-वाले स्थानमें और पिशाचादिसे युक्त स्थानमें योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे ॥ ७—९ ॥
स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः।
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः ॥ १० ॥
स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर, जड़ता—ये सब दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥
४८ * गीता-संग्रह *
एते दोषाः परित्याज्या योगाभ्यसनशालिना।
अनादरे हि चैतेषां स्मृतिलोपादयो ध्रुवम्॥ ११॥
योगाभ्यासीको ये सब दोषपूर्ण स्थान त्याग देने चाहिये, ऐसा न करनेसे अवश्य स्मृतिलोप आदि दोष होते हैं (अतः उपर्युक्त स्थानोंमें योगसाधन न करे) ॥११॥
नातिभुञ्जन् सदा योगी नाभुञ्जन्नातिनिद्रितः।
नातिजाग्रत्सिद्धिमेति भूप योगं सदाभ्यसन्॥ १२॥
हे राजन्! योगी सदा थोड़ा भोजन करे, बिना भोजन किये भी न रहे, न बहुत सोये, न बहुत जागे—इस प्रकार सदा योगाभ्यास करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो जाता है॥ १२॥
सङ्कल्पजांस्त्यजेत्कामान्नियताहारजागरः।
नियम्य खगणं बुद्ध्या विरमेत शनैः शनैः॥ १३॥
सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंका त्याग करे, थोड़ा भोजन करे, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इन्द्रियोंको वशमें करके शनैः-शनैः शान्तिको प्राप्त हो॥ १३॥
ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति।
धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमादृतः॥ १४॥
जिस-जिस स्थानमें मन जाय, उस-उस स्थानसे उसे खींचे और धैर्यसे उसे अपने वशमें करे, क्योंकि वह महाचंचल है॥ १४॥
एवं कुर्वन् सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति।
विश्वस्मिन्निजमात्मानं विश्वं च स्वात्मनीक्षते॥ १५॥
योगी सदा इस प्रकार करनेसे परम शान्तिको प्राप्त होता है और वह संसारमें अपनी आत्माको और अपनी आत्मामें संसारको देखता है॥ १५॥
- गणेशगीता * ४९
योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात्।
मोचयामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत्॥ १६॥
योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरपूर्वक प्राप्त होता हूँ और जो मुझे नहीं छोड़ता है, उसको मैं नहीं छोड़ता हूँ तथा संसारसे मुक्त कर देता हूँ॥ १६॥
सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि।
आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः॥ १७॥
जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि सङ्गतः।
ब्रह्मादीनां च देवानां स वन्द्यः स्याज्जगतत्रये॥ १८॥
सुख-दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृषा—इनमें जो आत्माके समान सब प्राणियोंको देखता है, जो मुझ सर्वव्यापीको जानता है और जो केवल मुझमें संलग्न है, वह जीवन्मुक्त है और वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंद्वारा नमस्कार करनेयोग्य है॥ १७-१८॥
वरेण्य उवाच
द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसम्भाव्यो हि मे मतः।
यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो॥ १९॥
**वरेण्य बोले—**हे भगवन्! इन दोनों प्रकारके योगोंको मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है॥ १९॥
श्रीगजानन उवाच
यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्।
घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात्॥ २०॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है॥ २०॥
५० * गीता-संग्रह *
विषयैः क्रकचैरेतत्संस्सृष्टं चक्रकं दृढम्।
जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम्॥ २१॥
विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है और कर्मरूपी कीलोंसे अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस कारण साधारण मनुष्य इसके छेदन करनेमें समर्थ नहीं होते॥ २१॥
अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च।
गुरुप्रसादः सत्सङ्ग उपायास्तज्जये अमी॥ २२॥
अतिशय दुःख, वैराग्य, भोगमें तृष्णाका त्याग, गुरुकी कृपा, सत्संग—ये इस (मन)-के जीतनेके उपाय हैं॥ २२॥
अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये।
वरेण्य दुर्लभो योगो विनास्य मनसो जयात्॥ २३॥
योगसिद्धिके निमत्त अभ्याससे मनको अपने वशमें करे, हे वरेण्य! बिना मनके जीते योग महाकठिन है॥ २३॥
वरेण्य उवाच
योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिः किं फलं भवेत्।
विभो सर्वज्ञ मे छिन्धि संशयं बुद्धिचक्रभृत्॥ २४॥
वरेण्य बोले—हे भगवन्! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ! हे बुद्धिरूपी चक्रको धारण करनेवाले! मेरे इस सन्देहका छेदन कीजिये॥ २४॥
श्रीगजानन उवाच
दिव्यदेहधरो योगाद् भ्रष्टः स्वभोगमुत्तमम्।
भुक्त्वा योगिकुले जन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले॥ २५॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] योगभ्रष्ट पुरुष दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उत्तम सुख भोगकर पुनः शुद्ध
* गणेशगीता * ५१
योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं॥ २५ ॥
पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात्।
न हि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते॥ २६॥
और फिर पूर्व जन्मोंके संस्कारसे यह योगी होता है। कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता॥ २६॥
ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ।
श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान् मयि तेषु यः॥ २७॥
हे राजन्! ज्ञाननिष्ठासे, तपकी निष्ठासे अथवा कर्मनिष्ठासे जो मुझमें भक्ति करता है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ योगी है॥ २७॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां योगवृत्तिप्रशंसनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
छठा अध्याय
श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना
श्रीगजानन उवाच
ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना।
यज्ज्ञात्वा मामसन्दिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम्॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार मुझमें मन लगाकर मेरा वह तत्त्व जानो, जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे॥ १॥
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।
अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥ २॥
हे राजन्! लोगोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती॥ २॥
५२
- गीता-संग्रह *
ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः। ततो विज्ञानसम्पत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत्॥ ३॥ प्रथम तो मेरी प्रकृतिको जानना चाहिये, उससे ज्ञान प्राप्त होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको विज्ञान-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है॥ ३॥
भ्वानलौ खमहङ्कारः कं चित्तं धीसमीरणौ। रवीन्दू यागकृच्चैकादशधा प्रकृतिमम॥ ४॥ पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, जल, चित्त, बुद्धि, वायु, रवि, चन्द्र, यजमान—यह ग्यारह प्रकारकी मेरी (अपरा) प्रकृति है॥ ४॥
अन्यां मत्प्रकृतिं वृद्धा मुनयः सङ्गिरन्ति च। तथा त्रिविष्टपं व्याप्तं जीवत्वं गतयानया॥ ५॥ और भी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं कि आने-जानेवाली, जीवत्वको प्राप्त हुई तथा त्रिलोकीमें व्याप्त भी मेरी दूसरी (परा) प्रकृति है॥ ५॥
आभ्यामुत्पद्यते सर्वं चराचरमयं जगत्। सद्भाद्विश्वस्य सम्भूतिः परित्राणं लयोऽप्यहम्॥ ६॥ इन दोनोंसे ही समस्त चराचर जगत् उत्पन्न होता है और इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और नाशका कर्ता मैं ही हूँ॥ ६॥
तत्त्वमेतन्निबोद्धुं मे यतते कश्चिदेव हि। वर्णाश्रमवतां पुंसां पुरा चीर्णेन कर्मणा॥ ७॥ मेरे इस तत्त्वको जाननेके निमित्त वर्णाश्रमी पुरुषोंमें पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार कोई एक यत्न करता है॥ ७॥
साक्षात्करोति मां कश्चिद्यत्नवत्स्वपि तेषु च। मत्तोऽन्यन्नेक्षते किञ्चिन्मयि सर्वं च वीक्षते॥ ८॥ उन यत्नवानोंमें कोई एक मेरा साक्षात् करता है, मुझसे अन्य और किसीको नहीं देखता और मुझमें सम्पूर्ण जगत्को देखता है॥ ८॥
- गणेशगीता * ५३
क्षितौ सुगन्धरूपेण तेजोरूपेण चाग्निषु।
प्रभारूपेण पूष्ण्यब्जे रसरूपेण चाप्सु च॥ ९॥
धीतपोबलिनां चाहं धीस्तपो बलमेव च।
त्रिविधेषु विकारेषु मदुत्पन्नेष्वहं स्थितः॥ १०॥
पृथ्वीमें सुगन्धिरूपसे, अग्निमें तेजरूपसे, सूर्य और चन्द्रमें प्रभारूपसे, जलमें रसरूपसे, बुद्धिमान्, तपस्वी एवं बलिष्ठोंमें बुद्धि, तप और बलरूपसे और मुझसे ही उत्पन्न हुए तीन प्रकारके विकारोंमें मैं ही स्थित हूँ॥ ९-१०॥
न मां विन्दति पापीयान् मायामोहितचेतनः।
त्रिविकारा मोहयति प्रकृतिर्मे जगत्त्रयम्॥ ११॥
मायासे मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन प्रकारके विकार (सत्, रज, तम)-वाली मेरी प्रकृति त्रिलोकीको मोहित करती रहती है॥ ११॥
यो मे तत्त्वं विजानाति मोहं त्यजति सोऽखिलम्।
अनेकैर्जन्मभिश्चैवं ज्ञात्वा मां मुच्यते ततः॥ १२॥
जो मेरे तत्त्वको जानता है, वह सम्पूर्ण मोहका त्याग करता है और अनेक जन्मोंमें मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है॥ १२॥
अन्ये नानाविधान् देवान् भजन्ते तान् व्रजन्ति ते।
यथा यथा मतिं कृत्वा भजते मां जनोऽखिलः॥ १३॥
तथा तथास्य तं भावं पूरयाम्यहमेव तम्।
अहं सर्वं विजानामि मां न कश्चिद्विबुद्ध्यते॥ १४॥
जो अनेक प्रकारके देवताओंका भजन करते हैं, वे उन्हींको प्राप्त होते हैं। सम्पूर्ण मनुष्य जैसी-जैसी मति करके मेरा भजन करते हैं, उसी प्रकारसे मैं उनके भावको पूर्ण करता हूँ। मैं सबको जानता हूँ, किंतु मुझे कोई पूरी तरह नहीं जानता॥ १३-१४॥
५४ * गीता-संग्रह *
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं न विदुः काममोहिताः। नाहं प्रकाशतां यामि अज्ञानां पापकर्मणाम्॥ १५॥
मुझ अव्यक्तके व्यक्त स्वरूपको कामसे मोहित दृष्टिवाले नहीं जानते, अज्ञानी और पापी पुरुषोंके लिये मैं प्रकट नहीं होता हूँ॥ १५॥
यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः। स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥ १६॥
जो अन्त समयमें श्रद्धायुक्त होकर मेरा स्मरण करते हुए अपना शरीर त्याग करता है, हे राजन्! वह मेरी कृपासे मुक्त हो जाता है॥ १६॥
यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप॥ १७॥
भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है॥ १७॥
अतश्चाहर्निशं भूप स्मर्तव्योऽनेकरूपवान्। सर्वेषामप्यहं गम्यः स्रोतसामर्णवो यथा॥ १८॥
इस कारण हे राजन्! रात-दिन मेरे अनेक रूप स्मरण करनेयोग्य हैं, उन सबसे मैं ही उसी प्रकार प्राप्त होता हूँ, जैसे नदियोंका जल सागरमें ही जाता है॥ १८॥
ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राद्याँल्लोकान् प्राप्य पुनः पतेत्। यो मामुपैत्यसन्दिग्धः पतनं तस्य न क्वचित्॥ १९॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त होकर वह फिर संसारमें जन्म लेता है, किंतु जो असन्दिग्ध होकर मुझको प्राप्त होता है, उसका फिर जन्म नहीं होता॥ १९॥