गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ * गीता-संग्रह *
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं न विदुः काममोहिताः। नाहं प्रकाशतां यामि अज्ञानां पापकर्मणाम्॥ १५॥
मुझ अव्यक्तके व्यक्त स्वरूपको कामसे मोहित दृष्टिवाले नहीं जानते, अज्ञानी और पापी पुरुषोंके लिये मैं प्रकट नहीं होता हूँ॥ १५॥
यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः। स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥ १६॥
जो अन्त समयमें श्रद्धायुक्त होकर मेरा स्मरण करते हुए अपना शरीर त्याग करता है, हे राजन्! वह मेरी कृपासे मुक्त हो जाता है॥ १६॥
यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप॥ १७॥
भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है॥ १७॥
अतश्चाहर्निशं भूप स्मर्तव्योऽनेकरूपवान्। सर्वेषामप्यहं गम्यः स्रोतसामर्णवो यथा॥ १८॥
इस कारण हे राजन्! रात-दिन मेरे अनेक रूप स्मरण करनेयोग्य हैं, उन सबसे मैं ही उसी प्रकार प्राप्त होता हूँ, जैसे नदियोंका जल सागरमें ही जाता है॥ १८॥
ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राद्याँल्लोकान् प्राप्य पुनः पतेत्। यो मामुपैत्यसन्दिग्धः पतनं तस्य न क्वचित्॥ १९॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त होकर वह फिर संसारमें जन्म लेता है, किंतु जो असन्दिग्ध होकर मुझको प्राप्त होता है, उसका फिर जन्म नहीं होता॥ १९॥