गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ५३
क्षितौ सुगन्धरूपेण तेजोरूपेण चाग्निषु।
प्रभारूपेण पूष्ण्यब्जे रसरूपेण चाप्सु च॥ ९॥
धीतपोबलिनां चाहं धीस्तपो बलमेव च।
त्रिविधेषु विकारेषु मदुत्पन्नेष्वहं स्थितः॥ १०॥
पृथ्वीमें सुगन्धिरूपसे, अग्निमें तेजरूपसे, सूर्य और चन्द्रमें प्रभारूपसे, जलमें रसरूपसे, बुद्धिमान्, तपस्वी एवं बलिष्ठोंमें बुद्धि, तप और बलरूपसे और मुझसे ही उत्पन्न हुए तीन प्रकारके विकारोंमें मैं ही स्थित हूँ॥ ९-१०॥
न मां विन्दति पापीयान् मायामोहितचेतनः।
त्रिविकारा मोहयति प्रकृतिर्मे जगत्त्रयम्॥ ११॥
मायासे मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन प्रकारके विकार (सत्, रज, तम)-वाली मेरी प्रकृति त्रिलोकीको मोहित करती रहती है॥ ११॥
यो मे तत्त्वं विजानाति मोहं त्यजति सोऽखिलम्।
अनेकैर्जन्मभिश्चैवं ज्ञात्वा मां मुच्यते ततः॥ १२॥
जो मेरे तत्त्वको जानता है, वह सम्पूर्ण मोहका त्याग करता है और अनेक जन्मोंमें मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है॥ १२॥
अन्ये नानाविधान् देवान् भजन्ते तान् व्रजन्ति ते।
यथा यथा मतिं कृत्वा भजते मां जनोऽखिलः॥ १३॥
तथा तथास्य तं भावं पूरयाम्यहमेव तम्।
अहं सर्वं विजानामि मां न कश्चिद्विबुद्ध्यते॥ १४॥
जो अनेक प्रकारके देवताओंका भजन करते हैं, वे उन्हींको प्राप्त होते हैं। सम्पूर्ण मनुष्य जैसी-जैसी मति करके मेरा भजन करते हैं, उसी प्रकारसे मैं उनके भावको पूर्ण करता हूँ। मैं सबको जानता हूँ, किंतु मुझे कोई पूरी तरह नहीं जानता॥ १३-१४॥