भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ५५

अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप।
योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥ २० ॥
हे राजन् ! जो अनन्यशरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल)-का विधान करता हूँ॥ २० ॥
विविधा गतिरुद्दिष्टा शुक्ला कृष्णा नृणां नृप।
एकया परं ब्रह्म परया याति संसृतिम् ॥ २१ ॥
हे राजन् ! मनुष्योंकी कृष्ण और शुक्लपक्षके भेदसे अनेक गतियाँ हैं, एकसे प्राणी संसारमें आता है और दूसरीसे परब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यसे उपासना-योगका वर्णन करना

वरेण्य उवाच
का शुक्ला गतिरुद्दिष्टा का च कृष्णा गजानन।
किं ब्रह्म संसृतिः का मे वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥ १ ॥
वरेण्य बोले— हे गजानन! शुक्लागति और कृष्णागति किसको कहते हैं, ब्रह्म क्या है और संसृति क्या है, यह सब आप मुझसे कृपाकर कहिये ॥ १ ॥

श्रीगजानन उवाच
अग्निज्योतिरहः शुक्ला कर्मार्हंमयनं गतिः।
चान्द्रं ज्योतिस्तथा धूमो रात्रिश्च दक्षिणायनम् ॥ २ ॥
कृष्णैते ब्रह्मसंसृत्योरवाप्तेः कारणं गती।
दृश्यादृश्यमिदं सर्वं ब्रह्मैवेत्यवधारय ॥ ३ ॥
श्रीगणेशजी बोले— अग्नि, ज्योति और दिवास्वरूपा शुक्लागति

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