भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गीता-संग्रह *

होती है, जो उत्तरायण है, चन्द्र, ज्योति, धूम और रात्रिस्वरूपा कृष्णागति दक्षिणायन कही गयी है। ये दोनों गतियाँ कर्मानुसार जीवोंको ब्रह्म और संसारकी प्राप्तिमें कारण हैं। यह सब दृश्य और अदृश्य ब्रह्म ही है—ऐसा जानो ॥ २-३ ॥

क्षरं पञ्चात्मकं विद्धि तदन्तरमक्षरं स्मृतम्। उभाभ्यां यदतिक्रान्तं शुद्धं विद्धि सनातनम्॥ ४॥ पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन दोनोंका अतिक्रमणकर शुद्ध सनातन ब्रह्मको जानो ॥ ४ ॥

अनेकजन्मसंभूतिः संसृतिः परिकीर्तिता। संसृतिं प्राप्नुवन्त्येते ये तु मां गणयन्ति न॥ ५॥ अनेक जन्मोंकी सम्भूति (आवागमन)-को संसृति कहते हैं, इस संसृतिको वे प्राप्त होते हैं, जो मुझे नहीं मानते ॥ ५ ॥

ये मां सम्यगुपासन्ते परं ब्रह्म प्रयान्ति ते। ध्यानाद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभिः ॥ ६ ॥ जो ध्यान, पूजन और पंचामृतादि उपचारोंसे सम्यक् प्रकारसे मेरी उपासना करते हैं, वे परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

स्नानवस्त्राद्यलङ्कारसुगन्धधूपदीपकैः । नैवेद्यैः फलताम्बूलैर्दक्षिणाभिश्च योऽर्चयेत् ॥ ७॥ भक्त्यैकचेतसा चैव तस्येष्टं पूरयाम्यहम्। एवं प्रतिदिनं भक्त्या मद्भक्तो मां समर्चयेत् ॥ ८ ॥ स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा आदिसे भक्तिपूर्वक एकचित्तसे जो मेरी पूजा करता है, मैं उसके मनोरथको पूर्ण करता हूँ। इस प्रकार प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मेरे भक्तको मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ७-८ ॥

अथवा मानसीं पूजां कुर्वीत स्थिरचेतसा। अथवा फलपत्राद्यैः पुष्पमूलजलादिभिः ॥ ९ ॥