भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ५७

पूजयेन्मां प्रयत्नेन तत्तदिष्टं फलं लभेत्।
त्रिविधास्वपि पूजासु श्रेयसी मानसी मता ॥१०॥

अथवा स्थिरचित्तसे मानसीपूजा करे अथवा फल, पत्र, पुष्प, मूल, जल आदिसे जो यत्नपूर्वक मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फलको प्राप्त करता है। तीनों प्रकारकी पूजामें मानसी पूजा श्रेष्ठ है॥९-१०॥

साप्युत्तमा मता पूजानिच्छया या कृता मम।
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिश्च यः॥११॥
एकां पूजां प्रकुर्वाणोऽप्यन्यो वा सिद्धिमृच्छति।
मदन्यदेवं यो भक्त्या द्विषन्मामन्यदेवताम् ॥ १२॥
सोऽपि मामेव यजते परं त्वविधितो नृप।
यो ह्यन्यदेवतां मां च द्विषन्नन्यां समर्चयेत् ॥ १३॥
याति कल्पसहस्त्रं स निरयान् दुःखभाक् सदा।

वह भी यदि कामनारहित होकर की जाय तो अति उत्तम है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी अथवा और कोई मेरी एक पूजाको करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे द्वेषकर जो अन्य किसी देवताका भक्तिसे पूजन करता है। हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु विधिपूर्वक नहीं, जो अन्य देवताका अथवा मेरा पूजन करके द्वेष करता है, वह सहस्त्र कल्पवर्षतक नरकमें पड़कर सदा दुःख भोगता है॥ ११-१३\frac{१}{२}॥

भूतशुद्धिं विधायादौ प्राणानां स्थापनं ततः॥ १४॥
आकृष्य चेतसो वृत्तिं ततो न्यासमुपक्रमेत्।
कृत्वान्तर्मातृकान्यासं बहिश्चाथ षडङ्गमम्॥ १५॥

प्रथम भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे। फिर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध करके न्यास करे, अन्तर्मातृकान्यास करके फिर बहिर्मातृकान्यास तथा षडंग न्यास करे॥ १४-१५॥

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