भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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५८ * गीता-संग्रह *


न्यासं च मूलमन्त्रस्य ततो ध्यात्वा जपेन्मनुम्।
स्थिरचित्तो जपेन्मन्त्रं यथा गुरुमुखागतम्॥ १६॥
इसके उपरान्त मूलमन्त्रका न्यास करके ध्यान करे और स्थिरचित्तसे गुरुमुखसे सुने हुए मन्त्रका जप करे॥ १६॥

जपं निवेद्य देवाय स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा।
एवं मां य उपासीत स लभेन्मोक्षमव्ययम्॥ १७॥
फिर देवताके निमित्त जपको निवेदनकर अनेक प्रकारसे स्तोत्रका पाठ करे, इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है, वह सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है॥ १७॥

य उपासनया हीनो धिङ्नरो व्यर्थजन्मभाक्।
यज्ञोऽहमौषधं मन्त्रोऽग्निराज्यं च हविर्हुतम्॥ १८॥
जो मनुष्य उपासनासे हीन है, उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, हवि और हुत—सब मेरा ही स्वरूप है॥ १८॥

ध्यानं ध्येयं स्तुतिं स्तोत्रं नतिर्भक्तिरुपासना।
त्रयी ज्ञेयं पवित्रं च पितामहपितामहः॥ १९॥
ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, वेदत्रयीसे जाननेयोग्य, पवित्र, पितामहका पितामह—सब मैं ही हूँ॥ १९॥

ॐकारः पावनः साक्षी प्रभुर्मित्रं गतिर्लयः।
उत्पत्तिः पोषको बीजं शरणं वा स एव च॥ २०॥
असन्मृत्युः सदमृतमात्मा ब्रह्माहमेव च।
दानं होमस्तपो भक्तिर्जपः स्वाध्याय एव च॥ २१॥
ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्, मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप, स्वाध्याय—यह सब मैं ही हूँ॥ २०-२१॥