गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ५९
यद्यत्करोति तत्सर्वं समे मयि निवेदयेत्।
योषितोऽथ दुराचाराः पापास्त्रैवर्णिकास्तथा॥ २२॥
मदाश्रया विमुच्यन्ते किं मद्भक्त्या द्विजातयः।
न विनश्यति मद्भक्तो ज्ञात्वेमा मद्दिभूतयः॥ २३॥
यह जो कुछ भी करे, सब मुझे निवेदन कर दे। मेरा आश्रय करनेवाले स्त्री, दुराचारी, पापी, क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त द्विजातिकी तो बात ही क्या है? मेरा भक्त मेरी इन विभूतियोंको जानकर कभी नष्ट नहीं होता॥ २२-२३॥
प्रभवं मे विभूतिश्च न देवा ऋषयो विदुः।
नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः॥ २४॥
यद्यच्छ्रेष्ठतमं लोके सा विभूतिर्निबोध मे॥ २५॥
मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियोंको देवता और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वमें व्याप्त होकर स्थित हूँ। जो-जो इस लोकमें श्रेष्ठतम हैं, वे सब मेरी विभूति हैं—ऐसा समझो॥ २४-२५॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्रूपका दर्शन कराना
वरेण्य उवाच
भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः।
उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः॥ १॥
वरेण्य बोले—हे भगवन्! नारदजीके मुखसे मैंने आपकी अनेक