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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

५६

  • गीता-संग्रह *

होती है, जो उत्तरायण है, चन्द्र, ज्योति, धूम और रात्रिस्वरूपा कृष्णागति दक्षिणायन कही गयी है। ये दोनों गतियाँ कर्मानुसार जीवोंको ब्रह्म और संसारकी प्राप्तिमें कारण हैं। यह सब दृश्य और अदृश्य ब्रह्म ही है—ऐसा जानो ॥ २-३ ॥

क्षरं पञ्चात्मकं विद्धि तदन्तरमक्षरं स्मृतम्। उभाभ्यां यदतिक्रान्तं शुद्धं विद्धि सनातनम्॥ ४॥ पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन दोनोंका अतिक्रमणकर शुद्ध सनातन ब्रह्मको जानो ॥ ४ ॥

अनेकजन्मसंभूतिः संसृतिः परिकीर्तिता। संसृतिं प्राप्नुवन्त्येते ये तु मां गणयन्ति न॥ ५॥ अनेक जन्मोंकी सम्भूति (आवागमन)-को संसृति कहते हैं, इस संसृतिको वे प्राप्त होते हैं, जो मुझे नहीं मानते ॥ ५ ॥

ये मां सम्यगुपासन्ते परं ब्रह्म प्रयान्ति ते। ध्यानाद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभिः ॥ ६ ॥ जो ध्यान, पूजन और पंचामृतादि उपचारोंसे सम्यक् प्रकारसे मेरी उपासना करते हैं, वे परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

स्नानवस्त्राद्यलङ्कारसुगन्धधूपदीपकैः । नैवेद्यैः फलताम्बूलैर्दक्षिणाभिश्च योऽर्चयेत् ॥ ७॥ भक्त्यैकचेतसा चैव तस्येष्टं पूरयाम्यहम्। एवं प्रतिदिनं भक्त्या मद्भक्तो मां समर्चयेत् ॥ ८ ॥ स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा आदिसे भक्तिपूर्वक एकचित्तसे जो मेरी पूजा करता है, मैं उसके मनोरथको पूर्ण करता हूँ। इस प्रकार प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मेरे भक्तको मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ७-८ ॥

अथवा मानसीं पूजां कुर्वीत स्थिरचेतसा। अथवा फलपत्राद्यैः पुष्पमूलजलादिभिः ॥ ९ ॥

  • गणेशगीता * ५७

पूजयेन्मां प्रयत्नेन तत्तदिष्टं फलं लभेत्।
त्रिविधास्वपि पूजासु श्रेयसी मानसी मता ॥१०॥

अथवा स्थिरचित्तसे मानसीपूजा करे अथवा फल, पत्र, पुष्प, मूल, जल आदिसे जो यत्नपूर्वक मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फलको प्राप्त करता है। तीनों प्रकारकी पूजामें मानसी पूजा श्रेष्ठ है॥९-१०॥

साप्युत्तमा मता पूजानिच्छया या कृता मम।
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिश्च यः॥११॥
एकां पूजां प्रकुर्वाणोऽप्यन्यो वा सिद्धिमृच्छति।
मदन्यदेवं यो भक्त्या द्विषन्मामन्यदेवताम् ॥ १२॥
सोऽपि मामेव यजते परं त्वविधितो नृप।
यो ह्यन्यदेवतां मां च द्विषन्नन्यां समर्चयेत् ॥ १३॥
याति कल्पसहस्त्रं स निरयान् दुःखभाक् सदा।

वह भी यदि कामनारहित होकर की जाय तो अति उत्तम है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी अथवा और कोई मेरी एक पूजाको करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे द्वेषकर जो अन्य किसी देवताका भक्तिसे पूजन करता है। हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु विधिपूर्वक नहीं, जो अन्य देवताका अथवा मेरा पूजन करके द्वेष करता है, वह सहस्त्र कल्पवर्षतक नरकमें पड़कर सदा दुःख भोगता है॥ ११-१३\frac{१}{२}॥

भूतशुद्धिं विधायादौ प्राणानां स्थापनं ततः॥ १४॥
आकृष्य चेतसो वृत्तिं ततो न्यासमुपक्रमेत्।
कृत्वान्तर्मातृकान्यासं बहिश्चाथ षडङ्गमम्॥ १५॥

प्रथम भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे। फिर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध करके न्यास करे, अन्तर्मातृकान्यास करके फिर बहिर्मातृकान्यास तथा षडंग न्यास करे॥ १४-१५॥

५८ * गीता-संग्रह *


न्यासं च मूलमन्त्रस्य ततो ध्यात्वा जपेन्मनुम्।
स्थिरचित्तो जपेन्मन्त्रं यथा गुरुमुखागतम्॥ १६॥
इसके उपरान्त मूलमन्त्रका न्यास करके ध्यान करे और स्थिरचित्तसे गुरुमुखसे सुने हुए मन्त्रका जप करे॥ १६॥

जपं निवेद्य देवाय स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा।
एवं मां य उपासीत स लभेन्मोक्षमव्ययम्॥ १७॥
फिर देवताके निमित्त जपको निवेदनकर अनेक प्रकारसे स्तोत्रका पाठ करे, इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है, वह सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है॥ १७॥

य उपासनया हीनो धिङ्नरो व्यर्थजन्मभाक्।
यज्ञोऽहमौषधं मन्त्रोऽग्निराज्यं च हविर्हुतम्॥ १८॥
जो मनुष्य उपासनासे हीन है, उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, हवि और हुत—सब मेरा ही स्वरूप है॥ १८॥

ध्यानं ध्येयं स्तुतिं स्तोत्रं नतिर्भक्तिरुपासना।
त्रयी ज्ञेयं पवित्रं च पितामहपितामहः॥ १९॥
ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, वेदत्रयीसे जाननेयोग्य, पवित्र, पितामहका पितामह—सब मैं ही हूँ॥ १९॥

ॐकारः पावनः साक्षी प्रभुर्मित्रं गतिर्लयः।
उत्पत्तिः पोषको बीजं शरणं वा स एव च॥ २०॥
असन्मृत्युः सदमृतमात्मा ब्रह्माहमेव च।
दानं होमस्तपो भक्तिर्जपः स्वाध्याय एव च॥ २१॥
ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्, मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप, स्वाध्याय—यह सब मैं ही हूँ॥ २०-२१॥

  • गणेशगीता * ५९

यद्यत्करोति तत्सर्वं समे मयि निवेदयेत्।
योषितोऽथ दुराचाराः पापास्त्रैवर्णिकास्तथा॥ २२॥
मदाश्रया विमुच्यन्ते किं मद्भक्त्या द्विजातयः।
न विनश्यति मद्भक्तो ज्ञात्वेमा मद्दिभूतयः॥ २३॥

यह जो कुछ भी करे, सब मुझे निवेदन कर दे। मेरा आश्रय करनेवाले स्त्री, दुराचारी, पापी, क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त द्विजातिकी तो बात ही क्या है? मेरा भक्त मेरी इन विभूतियोंको जानकर कभी नष्ट नहीं होता॥ २२-२३॥

प्रभवं मे विभूतिश्च न देवा ऋषयो विदुः।
नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः॥ २४॥
यद्यच्छ्रेष्ठतमं लोके सा विभूतिर्निबोध मे॥ २५॥

मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियोंको देवता और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वमें व्याप्त होकर स्थित हूँ। जो-जो इस लोकमें श्रेष्ठतम हैं, वे सब मेरी विभूति हैं—ऐसा समझो॥ २४-२५॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्रूपका दर्शन कराना

वरेण्य उवाच

भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः।
उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः॥ १॥

वरेण्य बोले—हे भगवन्! नारदजीके मुखसे मैंने आपकी अनेक

६०

  • गीता-संग्रह *

विभूतियोंका श्रवण किया है, उन्हें मैं जानता हूँ, सब नहीं जानते; क्योंकि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते॥ १॥
त्वमेव तत्त्वतः सर्वा वेत्सि ता द्विरदानन।
निजं रूपमिदानीं मे व्यापकं चारु दर्शय॥ २॥
हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्वसे जानते हैं, इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे दिखाइये॥ २॥

श्रीगजानन उवाच
एकस्मिन् मयि पश्य त्वं विश्वमेतच्चराचरम्।
नानाश्चर्याणि दिव्यानि पुरा दृष्टानि केनचित्॥ ३॥
श्रीगणेशजी बोले—अकेले मुझमें ही तुम यह चराचर संसार देखो और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो, जो पूर्वकालमें किसीने नहीं देखे हैं॥ ३॥
ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः।
चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम्॥ ४॥
मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ, क्योंकि मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देख सकते॥ ४॥

ब्रह्मोवाच
ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत।
ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम्॥ ५॥
ब्रह्माजी बोले—तब वे राजा वरेण्य दिव्य दृष्टिको प्राप्त होकर भगवान् गणेशजीके महान् अद्भुत परमरूपको देखनेमें समर्थ हुए॥ ५॥
असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्याङ्घ्रिकरं महत्।
अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम्॥ ६॥
असंख्यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम्।
तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥ ७॥
असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड एवं हाथ और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और मालासे शोभित, असंख्य नेत्र, करोड़ों

  • गणेशगीता * ६१

सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित आयुध धारण किये उनके शरीरमें राजाने अलग-अलग तीनों लोक देखे ॥ ६-७ ॥

वरेण्य उवाच

दृष्ट्वैश्वरं परं रूपं प्रणम्य स नृपोऽब्रवीत्।
वीक्षेऽहं तव देहेऽस्मिन् देवानृषिगणान् पितॄन्॥ ८॥

यह ईश्वरका परम रूप देख प्रणाम करके राजा (वरेण्य) बोले—हे भगवन्! मैं आपकी इस देहमें देवता-ऋषिगण और पितरोंको देख रहा हूँ॥ ८॥

पातालानां समुद्राणां द्वीपानां चैव भूभृताम्।
महर्षीणां सप्तकं च नानार्थैः सङ्कुलं विभो ॥ ९॥

हे विभो! मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात महर्षि और अनेक पदार्थोंके समूह देख रहा हूँ॥ ९॥

भुवोऽन्तरिक्षं स्वर्गांश्च मनुष्योरगराक्षसान्।
ब्रह्मविष्णुमहेशेन्द्रान् देवाञ्जन्तूननेकधा ॥ १० ॥

मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकारके जन्तुओंको देख रहा हूँ॥ १०॥

अनाद्यनन्तं लोकादिमनन्तभुजशीर्षकम्।
प्रदीप्तानलसङ्काशमप्रमेयं पुरातनम् ॥ ११ ॥

मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और सिरोंसे युक्त तथा जलती हुई अग्निके समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ॥ ११॥

किरीटकुण्डलधरं दुर्निरीक्ष्यं मुदावहम्।
एतादृशं च वीक्षे त्वां विशालवक्षसं प्रभुम् ॥ १२ ॥

मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाईसे देखनेयोग्य, आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थलयुक्त आप प्रभुका दर्शन कर रहा हूँ॥ १२॥

६२ * गीता-संग्रह *


सुरविद्याधरैर्यक्षैः किन्नरैर्मुनिमानुषैः।
नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैर्गानतत्परैः॥१३॥
देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए गन्धर्वोंसे आपका स्वरूप सेवित है॥१३॥

वसुरुद्रादित्यगणैः सिद्धैः साध्यैर्मुदायुतैः।
सेव्यमानमहाभक्त्यावीक्ष्यमाणं सुविस्मितैः॥१४॥
आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य—ये सब प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करते और महाभक्तिसे विस्मयको प्राप्त होकर आपको देखते हैं॥१४॥

वेत्तारमक्षरं वेद्यं धर्मगोप्तारमीश्वरम्।
पातालानि दिशः स्वर्गान् भुवं व्याप्याखिलं स्थितम्॥१५॥
ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्मके रक्षक, पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वीमें व्यापक और ईश्वर जानते हैं॥१५॥

भीता लोकास्तथा चाहमेवं त्वां वीक्ष्य रूपिणम्।
नानादंष्ट्राकरालं च नानाविद्याविशारदम्॥१६॥
आपके रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढ़ोंसे भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओंके पारगामी हैं॥१६॥

प्रलयानलदीप्तास्यं जटिलं च नभःस्पृशम्।
दृष्ट्वा गणेश ते रूपमहं भ्रान्त इवाभवम्॥१७॥
प्रलयकी अग्निके समान दीप्तिमान् आपका मुख है, जिसकी जटाएँ आकाशको छूती हैं, हे गणेशजी! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हो गया हूँ॥१७॥

देवा मनुष्या नागाद्याः खगास्त्वदुदरेशयाः।
नानायोनिभुजश्चान्ते त्वय्येव विशन्ति च।
अब्धेरुत्पद्यमानास्ते यथा जीमूतबिन्दवः॥१८॥
देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदरमें शयन करते हैं,

  • गणेशगीता * ६३

वे अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें आपमें ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जैसे सागरसे उत्पन्न हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें लीन होते हैं॥ १८॥

त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमश्चैव निर्ऋतिर्वरुणो मरुत् ॥ १९॥
गुह्यकेशस्तथेशानः सोमः सूर्योऽखिलं जगत्।
नमामि त्वामतः स्वामिन् प्रसादं कुरु मेऽधुना ॥ २० ॥

इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत्—यह सब आप ही हैं, हे स्वामिन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे ऊपर अब कृपा करें॥ १९-२०॥

दर्शयस्व निजं रूपं सौम्यं यत्पूर्वमीक्षितम्।
को वेद लीलास्ते भूमन् क्रियमाणा निजेच्छया ॥ २१॥

आप मेरेद्वारा पूर्वमें देखा हुआ अपना सौम्य रूप मुझे दिखाइये, हे भूमन्! अपनी इच्छासे क्रीडा करनेवाले आपकी लीलाको कौन जान सकता है? ॥ २१॥

अनुग्रहान् मया दृष्टमैश्वरं रूपमीदृशम्।
ज्ञानचक्षुर्यतो दत्तं प्रसन्नेन त्वया मम॥ २२॥

आपकी कृपासे मैंने इस प्रकारका ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे॥ २२॥

श्रीगजानन उवाच

नेदं रूपं महाबाहो मम पश्यन्त्ययोगिनः।
सनकाद्या नारदाद्याः पश्यन्ति मदनुग्रहात् ॥ २३ ॥

श्रीगणेशजी बोले—हे महाबाहु! योग न करनेवाले इस मेरे रूपका कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि तथा नारदादि मेरे अनुग्रहसे इस रूपका दर्शन करते हैं॥ २३॥

६४ * गीता-संग्रह *


चतुर्वेदार्थतत्त्वज्ञाश्चतुःशास्त्रविशारदाः ।
यज्ञदानतपोनिष्ठा न मे रूपं विदन्ति ते॥ २४॥
चारों वेदोंके अर्थके तत्त्वको जाननेवाले, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें कुशल, यज्ञ, दान और तप करनेवाले भी मेरे रूपको [यथार्थतः] नहीं जानते॥ २४॥
शक्योऽहं वीक्षितुं ज्ञातुं प्रवेष्टुं भक्तिभावतः।
त्यज भीतिं च मोहं च पश्य मां सौम्यरूपिणम्॥ २५॥
मैं भक्तिभावसे जानने, दीखने, प्राप्त होनेके योग्य हूँ, अब तुम भय और मोहको त्यागकर मेरे सौम्य रूपको देखो॥ २५॥
मद्भक्तो मत्परः सर्वसङ्गहीनो मदर्थकृत्।
निष्क्रोधः सर्वभूतेषु समो मामेति भूभुज॥ २६॥
हे राजन्! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्व संगत्यागी होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध त्यागकर सर्व प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ २६॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां विश्वरूपदर्शनो नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥


नवाँ अध्याय

सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन

वरेण्य उवाच
अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते।
योऽक्षरं परमव्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः॥ १॥
वरेण्य बोले—[हे भगवन्!] मूर्तिमान् आपकी जो अनन्यभावसे उपासना करते हैं और जो अक्षर एवं परम अव्यक्त आपकी उपासना करते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन है?॥ १॥

  • गणेशगीता * ६५

असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः।
अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो ॥ २ ॥

हे विभो ! आप सब जाननेवाले, सबके साक्षी, भूतभावन ईश्वर हैं, इस कारण मैं आपसे पूछता हूँ, आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥

श्रीगजानन उवाच

यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते।
स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ॥ ३ ॥

श्रीगणेशजी बोले—जो भक्त मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, वह हृदयमें मुझे धारण करनेवाला अनन्य भक्तिमान् मुझे [विशेष] मान्य है ॥ ३ ॥

खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत्।
ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटगं स्थिरम् ॥ ४ ॥
सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते।
संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके सब प्राणियोंका हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है तथा जो जाननेमें अशक्य मेरी उपासना करता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है, उसका भी मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूँ ॥ ४-५ ॥

अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते।
व्यक्तस्योपासनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ॥ ६ ॥

अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश भोगना पड़ता है। जो व्यक्तस्वरूपकी भक्तिसे प्राप्त होता है, वही अव्यक्तकी उपासनासे होता है ॥ ६ ॥

भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम्।
सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिञ्चिज्ज्ञोऽपि भक्तिमान् ॥ ७ ॥

थोड़ा जाननेवाला भी यदि भक्तिमान् हो तो वह सम्पूर्ण विद्वानोंमें श्रेष्ठ है। इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है ॥ ७ ॥

६६ * गीता-संग्रह *


भजन् भक्त्या विहीनो यः स चाण्डालोऽभिधीयते।
चाण्डालोऽपि भजन् भक्त्या ब्राह्मणेभ्योऽधिको मम॥८॥
जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है और जो जन्मसे चाण्डाल होकर भी मेरा भक्तिपूर्वक भजन करता है, वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है॥८॥

शुकाद्याः सनकाद्याश्च पुरा मुक्ता हि भक्तितः।
भक्त्यैव मामनुप्राप्ता नारदाद्याश्चिरायुषः॥९॥
शुकादि तथा सनकादि ऋषिगण भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं और भक्तिसे ही नारद और चिरजीवी मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं॥९॥

अतो भक्त्या मयि मनो निधेहि बुद्धिमैव च।
भक्त्या यजस्व मां राजंस्ततो मामेव यास्यसि॥१०॥
इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी चाहिये, हे राजन्! भक्तिपूर्वक मेरा यजन करोगे तो मुझको ही प्राप्त होओगे॥१०॥

असमर्थोऽर्पितुं स्वान्तमेवं मयि नराधिप।
अभ्यासेन च योगेन ततो गन्तुं यतस्व माम्॥११॥
हे राजन्! यदि मुझमें अपना मन न लगा सको तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त होनेका यत्न करो॥११॥

तत्रापि त्वमशक्तश्चेत्कुरु कर्म मदर्पणम्।
ममानुग्रहतश्चैवं परां निर्वृतिमेष्यसि॥१२॥
और जो यह भी न हो सके तो जो कुछ कर्म करो, उसे मुझे अर्पित करो, मेरी कृपासे तुम परम शान्तिको प्राप्त होओगे॥१२॥

अथैतदप्यनुष्ठातुं न शक्तोऽसि तदा कुरु।
प्रयत्नतः फलत्यागं त्रिविधानां हि कर्मणाम्॥१३॥
और यदि यह भी न कर सको तो यत्नपूर्वक तीनों प्रकारके

  • गणेशगीता * ६७

कर्मोंके फलका त्याग करो ॥ १३ ॥
श्रेयसी बुद्धिरवृत्तेस्ततो ध्यानं परं मतम्।
ततोऽखिलपरित्यागस्ततः शान्तिर्गरीयसी ॥ १४ ॥
प्रथम मुझमें बुद्धि लगना श्रेष्ठ है, उससे ध्यान श्रेष्ठ है, उससे सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति है ॥ १४ ॥
निरहं ममताबुद्धिरद्वेषः करुणा समः।
लाभालाभे सुखे दुःखे मानामाने स मे प्रियः ॥ १५ ॥
जो अहंकारका त्याग करनेवाला, ममता बुद्धिसे रहित, द्वेष न करनेवाला, सबमें करुणा रखनेवाला और लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमानमें एक दृष्टि रखनेवाला है, वह मेरा प्रिय है ॥ १५ ॥
यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम्।
उद्वेगभीः कोपमुद्वीरहितो यः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
जिसको देखकर किसीको भय नहीं होता और जो मनुष्योंसे भययुक्त नहीं होता है; उद्वेग, भय, क्रोध और हर्षसे जो रहित हो, वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥
रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्।
मौनी निश्चलधीभक्तिरसङ्गः स च मे प्रियः ॥ १७ ॥
शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोकमें जिसका चित्त एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है, वह मेरा प्रिय है ॥ १७ ॥
संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम्।
स वन्द्यः सर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियः सदा ॥ १८ ॥
जो मेरे इस उपदेशका पालन करता है, वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और वह मुक्तात्मा मेरा सदा प्रिय है ॥ १८ ॥
अनिष्टाप्तौ च न द्वेष्टीष्टप्राप्तौ न च तुष्यति।
क्षेत्रतज्ज्ञौ च यो वेत्ति स मे प्रियतमो भवेत् ॥ १९ ॥
जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता

६८ * गीता-संग्रह *


है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जानता है, वही मेरा सबसे प्रिय है॥१९॥

वरेण्य उवाच

किं क्षेत्रं कश्च तद्वेत्ति किं तज्ज्ञानं गजानन।
एतदाचक्ष्व मह्यं त्वं पृच्छते करुणाम्बुधे॥२०॥

वरेण्य बोले— हे गजानन! क्षेत्र क्या है और उसको जाननेवाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है, हे करुणासागर! मुझ प्रश्न करनेवालेको यह सब आप बताइये॥२०॥

श्रीगजानन उवाच

पञ्चभूतानि तन्मात्राः पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च।
अहङ्कारो मनो बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च॥२१॥
इच्छाव्यक्तं धृतिद्वेषौ सुखदुःखे तथैव च।
चेतनासहितश्चायं समूहः क्षेत्रमुच्यते॥२२॥

श्रीगणेशजी बोले— [पृथ्वी, जल आदि] पाँच महाभूत और उनकी [गन्ध, रस आदि] तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, अव्यक्त (मूल प्रकृति), इच्छा, धैर्य, द्वेष, सुख-दुःख और चेतनासहित यह सारा समूह क्षेत्र कहलाता है॥२१-२२॥

तज्ज्ञं त्वं विद्धि मां भूप सर्वान्तर्यामिणं विभुम्।
अयं समूहोऽहं चापि यज्ज्ञानविषयौ नृप॥२३॥

हे राजन्! उसको जाननेवाला सर्वान्तर्यामी सर्वव्यापक तुम मुझको जानो। मैं और यह समूह—ये दोनों ज्ञानके विषय हैं॥२३॥

आर्जवं गुरुशुश्रूषा विरक्तिश्चेन्द्रियार्थतः।
शौचं क्षान्तिरदम्भश्च जन्मादिदोषवीक्षणम्॥२४॥
समदृष्टिर्दृढा भक्तिरेकान्तित्वं शमो दमः।
एतैर्येच्च युतं ज्ञानं तज्ज्ञानं विद्धि बाहुज॥२५॥

सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंका विषयोंसे वैराग्य, पवित्रता,

  • गणेशगीता * ६९

सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादिमें दोषदृष्टि, समदृष्टि, दृढ़भक्ति, एकान्तता तथा शम-दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान समझो ॥ २४-२५॥

तज्ज्ञानविषयं राजन् ब्रवीमि त्वं शृणुष्व मे। यज्ज्ञात्वेति च निर्वाणं मुक्त्वा संसृतिसागरम्॥ २६॥

हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, तुम श्रवण करो, जिसके जाननेसे संसारसागरसे छूटकर मुक्त हो जाओगे ॥ २६॥

यदनादीन्द्रियैर्हीनं गुणभुग्गुणवर्जितम्। अव्यक्तं सदसद्भिन्नमिन्द्रियार्थावभासकम्॥ २७॥ विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते। बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसङ्गं तमसः परम्॥ २८॥

जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्-रज-तम आदि गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। विश्वको धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर अनेक रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८॥

दुर्ज्ञेयं चादिसूक्ष्मत्वादीप्तानामपि भासकम्। ज्ञेयमेतादृशं विद्धि ज्ञानगम्यं पुरातनम्॥ २९॥

अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९॥

एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः। गुणान् प्रकृतिजान् भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः॥ ३०॥

यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको भोगता है ॥ ३०॥

७० * गीता-संग्रह *


गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम्।
यदा प्रकाशः क्षान्तिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम्॥ ३१॥
प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है॥ ३१॥

लोभोऽशमः स्पृहारम्भः कर्मणां रजसो गुणः।
मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः॥ ३२॥
लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही तमोगुण जानना चाहिये॥ ३२॥

सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसङ्गं रजोऽधिकः।
तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत्॥ ३३॥
सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है॥ ३३॥

एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः।
प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतो भव॥ ३४॥
इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्! सत्त्वगुणयुक्त होओ॥ ३४॥

ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर।
भक्त्या चाव्यभिचारिण्या सर्वत्रैव च संस्थितम्॥ ३५॥
हे नरेश्वर! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो और निश्चल भक्तिसे सर्वत्र स्थित मुझे स्थित जानो॥ ३५॥

अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम्।
विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥ ३६॥
हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् ब्राह्मणमें

  • गणेशगीता * ७१

जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३६ ॥

अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च।
औषधींस्तेजसा सर्वा विश्वं चाप्याययाम्यहम् ॥ ३७ ॥

मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार करता हूँ और अपने तेजसे औषधि और जगत्को मैं ही पुष्ट करता हूँ ॥ ३७ ॥

सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनञ्जयम्।
भुनज्मि चाखिलान् भोगान् पुण्यपापविवर्जितः ॥ ३८ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनंजय नामक प्राण और जठराग्निरूपसे पाप-पुण्यरहित होकर मैं ही सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूँ ॥ ३८ ॥

अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः।
इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥ ३९ ॥

मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥

येन येन हि रूपेण जनो मां पर्युपासते।
तथा तथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥ ४० ॥

जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप दिखाता हूँ ॥ ४० ॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम्।
अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥

हे राजन् ! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने बता दिया ॥ ४१ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां क्षेत्रज्ञातृज्ञानज्ञेयविवेकयोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

७२ * गीता-संग्रह *


दसवाँ अध्याय

दैवी और आसुरी प्रकृति

श्रीगजानन उवाच

दैव्यासुरि राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम्।
तासां फलानि चिह्नानि सङ्क्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी—तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ॥ १॥

आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप।
चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु॥ २॥
दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो॥ २॥

अपैशुन्यं दयाक्रोधोऽचापल्यं धृतिरार्जवम्।
तेजोऽभयमहिंसा च क्षमा शौचममानिता।
इत्यादि चिह्नमाद्याया आसुर्याः शृणु साम्प्रतम्॥ ३॥
चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब आसुरीके चिह्न सुनो॥ ३॥

अतिवादोऽभिमानश्च दर्पोऽज्ञानं सकोपता।
आसुर्या एवमाद्यानि चिह्नानि प्रकृतेर्नृप॥ ४॥
हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं॥ ४॥

निष्ठुरत्वं मदो मोहोऽहङ्कारो गर्व एव च॥ ५॥
द्वेषो हिंसादया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता।
अभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा॥ ६॥
(राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं—) निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार,

  • गणेशगीता * ७३

गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर कर्मोंमें प्रीति ॥ ५-६ ॥
अविश्वासः सतां वाक्येऽशुचित्वं कर्महीनता।
निन्दकत्वं च वेदानां भक्तानामसुरद्विषाम् ॥ ७ ॥
मुनिश्रोत्रियविप्राणां तथा स्मृतिपुराणयोः।
पाखण्डवाक्ये विश्वासः सङ्गतिर्मलिनात्मनाम् ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड-वाक्यमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति करना ॥ ७-८ ॥

सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु।
अनेककामनावत्त्वं सर्वदानृतभाषणम् ॥ ९ ॥
परोत्कर्षासहिष्णुत्वं परकृत्यपराहतिः।
इत्याद्या बहवश्चान्ये राक्षस्याः प्रकृतेर्गुणाः ॥ १० ॥
पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको पानेकी इच्छा, अनेक कामनायुक्त होना, सदा झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके गुण हैं ॥ ९-१० ॥

पृथिव्यां स्वर्गलोके च परिवृत्य वसन्ति ते।
मद्भक्तिरहिता लोका राक्षसीं प्रकृतिं श्रिताः ॥ ११ ॥
पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं, जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

तामसीं ये श्रिता राजन् यान्ति ते रौरवं ध्रुवम्।
अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः ॥ १२ ॥
हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिको प्राप्त हैं, वे रौरवनरकको

७४ * गीता-संग्रह *


प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय दुःखको भोगते हैं ॥ १२॥
दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः।
जात्यन्धाः पङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप॥१३॥
हे राजन्! कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें जन्म लेते हैं तो वे कुबड़े होते हैं या जन्मान्ध, लँगड़े, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥
पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते।
उत्पतन्ति हि मद्भक्ता यां काञ्चिद्योनिमाश्रिताः ॥ १४ ॥
पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी योनिमें जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥
लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप।
सुलभा सा सकामानां मयि भक्तिः सुदुर्लभा॥१५॥
हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है, जो सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परंतु मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥
विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा।
अहं हन्ता अहं कर्ता अहं भोक्तेति वादिनः ॥ १६ ॥
मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— ऐसा कहा करते हैं ॥ १६ ॥
अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी।
एतादृशी मतिर्नृणामधः पातयतीह तान्॥ १७॥
मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें ले जाती है ॥ १७ ॥
तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय।
भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥ १८ ॥
इस कारण इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर दैवी प्रकृतिका

  • गणेशगीता * ७५

आश्रय करो और तुम दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर भक्ति करो ॥ १८ ॥
सापि भक्तिस्त्रिधा राजन् सात्त्विकी राजसी तमा।
यद्देवान् भजते भक्त्या सात्त्विकी सा मता शुभा ॥ १९ ॥
हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जिस भक्तिसे देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी सात्त्विकी भक्ति कही गयी है ॥ १९ ॥
राजसी सा तु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा।
यद्यक्षाँश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥
जन्म-मृत्यु देनेवाली राजसी कही गयी भक्ति वह है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥
वेदेनाविहितं क्रूरं साहङ्कारं सदम्भकम्।
भजन्ते प्रेतभूतादीन् कर्म कुर्वन्ति कामुकम् ॥ २१ ॥
शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः।
तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥ २२ ॥
वेदविधानसे रहित, क्रूर, अहंकार तथा दम्भसहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥
कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी।
महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ २३ ॥
काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥