भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ७१

जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३६ ॥

अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च।
औषधींस्तेजसा सर्वा विश्वं चाप्याययाम्यहम् ॥ ३७ ॥

मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार करता हूँ और अपने तेजसे औषधि और जगत्को मैं ही पुष्ट करता हूँ ॥ ३७ ॥

सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनञ्जयम्।
भुनज्मि चाखिलान् भोगान् पुण्यपापविवर्जितः ॥ ३८ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनंजय नामक प्राण और जठराग्निरूपसे पाप-पुण्यरहित होकर मैं ही सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूँ ॥ ३८ ॥

अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः।
इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥ ३९ ॥

मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥

येन येन हि रूपेण जनो मां पर्युपासते।
तथा तथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥ ४० ॥

जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप दिखाता हूँ ॥ ४० ॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम्।
अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥

हे राजन् ! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने बता दिया ॥ ४१ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां क्षेत्रज्ञातृज्ञानज्ञेयविवेकयोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

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