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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ
  • गणेशगीता * ७१

जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३६ ॥

अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च।
औषधींस्तेजसा सर्वा विश्वं चाप्याययाम्यहम् ॥ ३७ ॥

मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार करता हूँ और अपने तेजसे औषधि और जगत्को मैं ही पुष्ट करता हूँ ॥ ३७ ॥

सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनञ्जयम्।
भुनज्मि चाखिलान् भोगान् पुण्यपापविवर्जितः ॥ ३८ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनंजय नामक प्राण और जठराग्निरूपसे पाप-पुण्यरहित होकर मैं ही सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूँ ॥ ३८ ॥

अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः।
इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥ ३९ ॥

मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥

येन येन हि रूपेण जनो मां पर्युपासते।
तथा तथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥ ४० ॥

जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप दिखाता हूँ ॥ ४० ॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम्।
अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥

हे राजन् ! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने बता दिया ॥ ४१ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां क्षेत्रज्ञातृज्ञानज्ञेयविवेकयोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

७२ * गीता-संग्रह *


दसवाँ अध्याय

दैवी और आसुरी प्रकृति

श्रीगजानन उवाच

दैव्यासुरि राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम्।
तासां फलानि चिह्नानि सङ्क्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी—तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ॥ १॥

आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप।
चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु॥ २॥
दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो॥ २॥

अपैशुन्यं दयाक्रोधोऽचापल्यं धृतिरार्जवम्।
तेजोऽभयमहिंसा च क्षमा शौचममानिता।
इत्यादि चिह्नमाद्याया आसुर्याः शृणु साम्प्रतम्॥ ३॥
चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब आसुरीके चिह्न सुनो॥ ३॥

अतिवादोऽभिमानश्च दर्पोऽज्ञानं सकोपता।
आसुर्या एवमाद्यानि चिह्नानि प्रकृतेर्नृप॥ ४॥
हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं॥ ४॥

निष्ठुरत्वं मदो मोहोऽहङ्कारो गर्व एव च॥ ५॥
द्वेषो हिंसादया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता।
अभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा॥ ६॥
(राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं—) निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार,

  • गणेशगीता * ७३

गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर कर्मोंमें प्रीति ॥ ५-६ ॥
अविश्वासः सतां वाक्येऽशुचित्वं कर्महीनता।
निन्दकत्वं च वेदानां भक्तानामसुरद्विषाम् ॥ ७ ॥
मुनिश्रोत्रियविप्राणां तथा स्मृतिपुराणयोः।
पाखण्डवाक्ये विश्वासः सङ्गतिर्मलिनात्मनाम् ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड-वाक्यमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति करना ॥ ७-८ ॥

सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु।
अनेककामनावत्त्वं सर्वदानृतभाषणम् ॥ ९ ॥
परोत्कर्षासहिष्णुत्वं परकृत्यपराहतिः।
इत्याद्या बहवश्चान्ये राक्षस्याः प्रकृतेर्गुणाः ॥ १० ॥
पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको पानेकी इच्छा, अनेक कामनायुक्त होना, सदा झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके गुण हैं ॥ ९-१० ॥

पृथिव्यां स्वर्गलोके च परिवृत्य वसन्ति ते।
मद्भक्तिरहिता लोका राक्षसीं प्रकृतिं श्रिताः ॥ ११ ॥
पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं, जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

तामसीं ये श्रिता राजन् यान्ति ते रौरवं ध्रुवम्।
अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः ॥ १२ ॥
हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिको प्राप्त हैं, वे रौरवनरकको

७४ * गीता-संग्रह *


प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय दुःखको भोगते हैं ॥ १२॥
दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः।
जात्यन्धाः पङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप॥१३॥
हे राजन्! कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें जन्म लेते हैं तो वे कुबड़े होते हैं या जन्मान्ध, लँगड़े, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥
पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते।
उत्पतन्ति हि मद्भक्ता यां काञ्चिद्योनिमाश्रिताः ॥ १४ ॥
पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी योनिमें जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥
लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप।
सुलभा सा सकामानां मयि भक्तिः सुदुर्लभा॥१५॥
हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है, जो सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परंतु मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥
विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा।
अहं हन्ता अहं कर्ता अहं भोक्तेति वादिनः ॥ १६ ॥
मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— ऐसा कहा करते हैं ॥ १६ ॥
अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी।
एतादृशी मतिर्नृणामधः पातयतीह तान्॥ १७॥
मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें ले जाती है ॥ १७ ॥
तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय।
भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥ १८ ॥
इस कारण इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर दैवी प्रकृतिका

  • गणेशगीता * ७५

आश्रय करो और तुम दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर भक्ति करो ॥ १८ ॥
सापि भक्तिस्त्रिधा राजन् सात्त्विकी राजसी तमा।
यद्देवान् भजते भक्त्या सात्त्विकी सा मता शुभा ॥ १९ ॥
हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जिस भक्तिसे देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी सात्त्विकी भक्ति कही गयी है ॥ १९ ॥
राजसी सा तु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा।
यद्यक्षाँश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥
जन्म-मृत्यु देनेवाली राजसी कही गयी भक्ति वह है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥
वेदेनाविहितं क्रूरं साहङ्कारं सदम्भकम्।
भजन्ते प्रेतभूतादीन् कर्म कुर्वन्ति कामुकम् ॥ २१ ॥
शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः।
तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥ २२ ॥
वेदविधानसे रहित, क्रूर, अहंकार तथा दम्भसहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥
कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी।
महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ २३ ॥
काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

७६

  • गीता-संग्रह *

ग्यारहवाँ अध्याय

तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा

श्रीगजानन उवाच

तपोऽपि त्रिविधं राजन् कायिकादिप्रभेदतः।
ऋजुतार्जवशौचानि ब्रह्मचर्यमहिंसनम्॥ १ ॥
गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम्।
स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम्॥ २ ॥

श्रीगणेशजी बोले— हे राजन्! कायिक, वाचिक और मानसिक—इन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु-पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है॥ १-२॥

मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम्।
अधीतिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम्॥ ३ ॥

मर्मस्पर्शी प्रिय वचन बोलना, उद्वेगरहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद-शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है॥ ३ ॥

अन्तःप्रसादः शान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः।
निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम्॥ ४ ॥

अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है॥ ४ ॥

अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत्।
ऋद्ध्यै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः॥ ५ ॥

निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है, वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त तथा दम्भसहित जो किया

  • गणेशगीता * ७७

जाता है, वह राजसी तप है ॥ ५ ॥ तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः। परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥ राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको देनेवाला है और जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह तामस तप कहा गया है ॥ ६ ॥ विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः। श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥ ७ ॥ विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है ॥ ७ ॥ उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः। क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥ ८ ॥ उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है ॥ ८ ॥ अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत्। असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥ ९ ॥ जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है ॥ ९ ॥ ज्ञानं च त्रिविधं राजन् शृणुष्व स्थिरचेतसा। त्रिधा कर्म च कर्तारं ब्रवीमि ते प्रसङ्गतः ॥ १० ॥ हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ ॥ १० ॥ नानाविधेषु भूतेषु मामेकं वीक्षते तु यः। नाशवत्सु च नित्यं मां तज्ज्ञानं सात्त्विकं नृप ॥ ११ ॥ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही देखता है तथा

७८ * गीता-संग्रह *

नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है ॥ ११ ॥

तेषु वेत्ति पृथग्भूतं विविधं भावमाश्रितः।
मामव्ययं च तज्ज्ञानं राजसं परिकीर्तितम् ॥ १२ ॥

जो अनेक उन भूतोंसे मुझे पृथक् भावका आश्रय लेकर और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजस है ॥ १२ ॥

हेतुहीनमसत्यं च देहात्मविषयं च यत्।
असदल्पार्थविषयं तामसं ज्ञानमुच्यते ॥ १३ ॥

हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका नाम तामस है ॥ १३ ॥

भेदतस्त्रिविधं कर्म विद्धि राजन् मयेरितम्।
कामनाद्वेषदम्भैर्यद्रहितं नित्यकर्म यत्।
कृतं विना फलेच्छां यत्कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ १४ ॥

हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ, सुनो, कामना, द्वेष और दम्भरहित जो नित्य कर्म है और फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है ॥ १४ ॥

यद्बहुक्लेशतः कर्म कृतं यच्च फलेच्छया।
क्रियमाणं नृभिर्दम्भात्कर्म राजसमुच्यते ॥ १५ ॥

अनपेक्ष्य स्वशक्तिं यदर्थक्षयकरं च यत्।
अज्ञानात्क्रियमाणं यत्कर्म तामसमीरितम् ॥ १६ ॥

जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है ॥ १५-१६ ॥

  • गणेशगीता * ७९

कर्तारं त्रिविधं विद्धि कथ्यमानं मया नृप ॥ १७ ॥
धैर्योत्साही समोऽसिद्धौ सिद्धौ चाविक्रियस्तु यः।
अहङ्कारविमुक्तो यः स कर्ता सात्त्विको नृप ॥ १८ ॥
इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है ॥ १७-१८ ॥

कुर्वन् हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः।
अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते ॥ १९ ॥
जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसा और फलमें इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है ॥ १९ ॥

प्रमादाज्ञानसहितः परोच्छेदपरः शठः।
अलसस्तर्कवान् यस्तु कर्तासौ तामसो मतः ॥ २० ॥
प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा जाता है ॥ २० ॥

सुखं च त्रिविधं राजन् दुःखं च क्रमशः शृणु।
सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च मयोच्यते ॥ २१ ॥
हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ ॥ २१ ॥

विषवद्भासते पूर्वं दुःखस्यान्तकरं च यत्।
इच्छमानं तथा वृत्त्या यदन्तेऽमृतवद्भवेत्।
प्रसादात्स्वस्य बुद्धेर्यत्सात्त्विकं सुखमीरितम् ॥ २२ ॥
जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु दुःखका अन्त करनेवाला हो और मनोवृत्तिसे इच्छा किया हुआ जो अन्तमें अमृतके समान हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है ॥ २२ ॥

८० * गीता-संग्रह *


विषयाणां तु यो भोगो भासतेऽमृतवत्पुरा।
हालाहलमिवान्ते यद्राजसं सुखमीरितम्॥ २३॥
विषयोंका जो भोग प्रथम तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २३॥

तन्द्राप्रमादसम्भूतमालस्यप्रभवं च यत्।
सर्वदा मोहकं स्वस्य सुखं तामसमीदृशम्॥ २४॥
न तदस्ति यदेतैर्यन्युक्तं स्यात्त्रिविधैर्गुणैः॥ २५॥
जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे भरा हुआ हो तथा अपनेको सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥

राजन् ब्रह्मापि त्रिविधमोन्तत्सदिति भेदतः।
त्रिलोकेषु त्रिधाभूतमखिलं भूप वर्तते॥ २६॥
हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं॥ २६॥

ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः स्वभावाद्भिन्नकर्मिणः।
तानि तेषां तु कर्माणि सङ्क्षेपात्तेऽधुना वदे॥ २७॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २७॥

अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा।
नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः॥ २८॥
वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च।
अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम्॥ २९॥
बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता, क्षमा, अनेक

  • गणेशगीता * ८१

प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय-व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥

दाढर्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम्।
शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम्॥ ३०॥
प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम्।
पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम्॥ ३१॥

दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म हैं॥ ३०-३१॥

नानावस्तुक्रयो भूमेः कर्षणं रक्षणं गवाम्।
त्रिधा कर्माधिकारित्वं वैश्यकर्म समीरितम्॥ ३२॥

अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय-विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं॥ ३२॥

दानं द्विजानां शुश्रूषा सर्वदा शिवसेवनम्।
एतादृशं नरव्याघ्र कर्म शौद्रमुदीरितम्॥ ३३॥

दान, ब्राह्मणोंकी सेवा, सदा शिवजीकी उपासना, हे राजन्! यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३३॥

स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः।
मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप॥ ३४॥

हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥

८२ * गीता-संग्रह *


इति ते कथितो राजन् प्रसादाद्योग उत्तमः।
साङ्गोपाङ्गः सविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय॥ ३५॥
प्रिय राजन्! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग-उपांगसहित विस्तार-पूर्वक अनादि सिद्धयोगका वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है॥ ३५॥

युंक्ष्व योगं मयाख्यातं नाख्यातं कस्यचिन्नृप।
गोपयैनं ततः सिद्धिं परां यास्यस्यनुत्तमाम्॥ ३६॥
हे राजन्! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे॥ ३६॥

व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नस्य महात्मनः।
गणेशस्य वरेण्यः स चकार च यथोदितम्॥ ३७॥
व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके अनुसार आचरण किया॥ ३७॥

त्यक्त्वा राज्यं कुटुम्बं च कान्तारं प्रययौ रयात्।
उपदिष्टं यथा योगमास्थाय मुक्तिमाप्तवान्॥ ३८॥
राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वह वनको चला गया और उपदेश किये गये योगमें स्थित होकर मुक्त हो गया॥ ३८॥

इमं गोप्यतमं योगं शृणोति श्रद्धया तु यः।
सोऽपि कैवल्यमाप्नोति यथा योगी तथैव सः॥ ३९॥
इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार योगी होते हैं॥ ३९॥

य इमं श्रावयेद्योगं कृत्वा स्वार्थं सुबुद्धिमान्।
यथा योगी तथा सोऽपि परं निर्वाणमृच्छति॥ ४०॥
जो बुद्धिमान् इस योगको स्वयं प्राप्त करके दूसरोंको सुनाता है, वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है॥ ४०॥

  • गणेशगीता * ८३

यो गीतां सम्यगभ्यस्य ज्ञात्वा चार्थं गुरोर्मुखात्।
कृत्वा पूजां गणेशस्य प्रत्यहं पठते तु यः॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वापि यः पठेत्।
ब्रह्मीभूतस्य तस्यापि दर्शनान्मुच्यते नरः॥४२॥

जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालमें पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है॥४१-४२॥

न यज्ञैर्न व्रतैर्दानैर्नाग्निहोत्रैर्महाधनैः।
न वेदैः सम्यगभ्यस्तैः सम्यग्ज्ञातैः सहाङ्गकैः॥४३॥
पुराणश्रवणैर्नैव न शास्त्रैः साधुचिन्तितैः।
प्राप्यते ब्रह्म परममनया प्राप्यते नरैः॥४४॥

न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन, न सांगोपांग वेदोंके उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है॥४३-४४॥

ब्रह्मघ्नो मद्यपस्तेयी गुरुतल्पगमोऽपि यः।
चतुर्णां यस्तु संसर्गी महापातककारिणाम्॥४५॥
स्त्रीहिंसागोवधादीनां कर्तारो ये च पापिनः।
ते सर्वे प्रतिमुच्यन्ते गीतामेतां पठन्ति चेत्॥४६॥

ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा, गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताके पढ़नेसे पापमुक्त हो जाते हैं॥४५-४६॥

यः पठेत्प्रयतो नित्यं स गणेशो न संशयः।
चतुर्थ्यां च पठेद्भक्त्या सोऽपि मोक्षाय कल्पते॥४७॥

जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप

२- भिक्षुगीता (श्रीमद्भागवत)

८४ * गीता-संग्रह *


हो जाता है और जो चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है॥ ४७॥

तत्तत्क्षेत्रं समासाद्य स्नात्वाभ्यर्च्य गजाननम्।
सकृद्गीतां पठन् भक्त्या ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ४८॥
उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नानकर गणेशजीका पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है॥ ४८॥

भाद्रे मासे सिते पक्षे चतुर्थ्यां भक्तिमान्नरः।
कृत्वा महीमयीं मूर्तिं गणेशस्य चतुर्भुजाम्॥ ४९॥
सवाहनां सायुधां च समभ्यर्च्य यथाविधि।
यः पठेत्सप्तकृत्वस्तु गीतामेतां प्रयत्नतः॥ ५०॥
ददाति तस्य सन्तुष्टो गणेशो भोगमुत्तमम्।
पुत्रान् पौत्रान् धनं धान्यं पशुरत्नादिसम्पदः॥ ५१॥
भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं॥ ४९-५१॥

विद्यार्थिनो भवेद्विद्या सुखार्थी सुखमाप्नुयात्।
कामानन्याँल्लभेत्कामी मुक्तिमन्ते प्रयान्ति ते॥ ५२॥
विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको कामकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको प्राप्त होते हैं॥ ५२॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां त्रिविधवस्तुविवेक-
निरूपणयोगो नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

भिक्षुगीता

[श्रीमद्भागवतमहापुराणके एकादश स्कन्धमें भिक्षुगीता प्राप्त है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णने अपने परमसखा उद्धवजीको एक भिक्षुके प्राचीन आख्यानके माध्यमसे मनोजयके उपाय समझाये हैं। यदि दुर्जन लोग मनको क्षुब्ध करनेवाले आचरण भी करें तो भी मुमुक्षु मनुष्यको उद्वेलित न होकर उन्हें पूर्ण क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सुख अथवा दुःखका कारण कोई और नहीं अपितु मन ही है। यही मोहासक्त मन जीवको कर्मबन्धनमें डालता है। इस मनका किसी भी प्रकार एकाग्र होकर भगवान्में लग जाना ही परम योग है। मार्मिक ज्ञानोपदेशवाली यह साधकोपयोगी भिक्षुगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

बादरायणिरुवाच

स एवमाशंसित उद्धवेन
भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः ।
सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-
स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः ॥ १ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—[परीक्षित्!] वास्तवमें भगवान्की लीलाकथा ही श्रवण करनेयोग्य है। वे ही प्रेम और मुक्तिके दाता हैं। जब उनके परमप्रेमी भक्त उद्धवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, तब यदुवंशविभूषण श्रीभगवान्ने उनके प्रश्नकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

श्रीभगवानुवाच

बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनैरितैः ।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥ २ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे सन्त पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे

८६ * गीता-संग्रह *


बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल सकें॥ २॥
न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः।
यथा तुदन्ति मर्मस्था हृत्सतां परुषेषवः॥ ३॥
मनुष्यका हृदय मर्मभेदी बाणोंसे बिंधनेपर भी उतनी पीड़ाका अनुभव नहीं करता, जितनी पीड़ा उसे दुष्टजनोंके मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुँचाते हैं॥ ३॥
कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव।
तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः॥ ४॥
उद्धवजी! इस विषयमें महात्मालोग एक बड़ा पवित्र प्राचीन इतिहास कहा करते हैं; मैं वही तुम्हें सुनाऊँगा, तुम मन लगाकर उसे सुनो॥ ४॥
केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः।
स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम्॥ ५॥
एक भिक्षुकको दुष्टोंने बहुत सताया था। उस समय भी उसने अपना धैर्य न छोड़ा और उसे अपने पूर्वजन्मके कर्मोंका फल समझकर कुछ अपने मानसिक उद्गार प्रकट किये थे। उन्हींका इस इतिहासमें वर्णन है॥ ५॥
अवन्तिषु द्विजः कश्चिदासीदाढ्यतमः श्रिया।
वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः॥ ६॥
प्राचीन समयकी बात है, उज्जैनमें एक ब्राह्मण रहता था। उसने खेती-व्यापार आदि करके बहुत-सी धन-सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी। वह बहुत ही कृपण, कामी और लोभी था। क्रोध तो उसे बात-बातमें आ जाया करता था॥ ६॥
ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।
शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥ ७॥
उसने अपने जाति-बन्धु और अतिथियोंको कभी मीठी बातसे

  • भिक्षुगीता * | ८७

भी प्रसन्न नहीं किया, खिलाने-पिलानेकी तो बात ही क्या है। वह धर्म-कर्मसे रीते घरमें रहता और स्वयं भी अपनी धन-सम्पत्तिके द्वारा समयपर अपने शरीरको भी सुखी नहीं करता था॥ ७॥
दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।
दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचजन् प्रियम्॥ ८॥
उसकी कृपणता और बुरे स्वभावके कारण उसके बेटे-बेटी, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और पत्नी आदि सभी दुःखी रहते और मन-ही-मन उसका अनिष्टचिन्तन किया करते थे। कोई भी उसके मनको प्रिय लगनेवाला व्यवहार नहीं करता था॥ ८॥
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।
धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पञ्चभागिनः॥ ९॥
वह लोक-परलोक दोनोंसे ही गिर गया था। बस, यक्षोंके समान धनकी रखवाली करता रहता था। उस धनसे वह न तो धर्म कमाता था और न भोग ही भोगता था। बहुत दिनोंतक इस प्रकार जीवन बितानेसे उसपर पंचमहायज्ञके भागी देवता बिगड़ उठे॥ ९॥
तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।
अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासपरिश्रमः॥ १०॥
उदार उद्धवजी! पंचमहायज्ञके भागियोंके तिरस्कारसे उसके पूर्व-पुण्योंका सहारा—जिसके बलसे अबतक धन टिका हुआ था, जाता रहा और जिसे उसने बड़े उद्योग और परिश्रमसे इकट्ठा किया था, वह धन उसकी आँखोंके सामने ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया॥ १०॥
ज्ञातयो जगृहुः किञ्चित् किञ्चिद् दस्यव उद्धव।
दैवतः कालतः किञ्चिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात्॥ ११॥
उद्धवजी! उस नीच ब्राह्मणका कुछ धन तो उसके कुटुम्बियोंने ही छीन लिया, कुछ चोर चुरा ले गये। कुछ आग लग जाने आदि दैवी कोपसे

८८ * गीता-संग्रह *


नष्ट हो गया, कुछ समयके फेरसे मारा गया। कुछ साधारण मनुष्योंने ले लिया और बचा-खुचा कर और दण्डके रूपमें शासकोंने हड़प लिया ॥ ११ ॥

स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः।
उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम् ॥ १२ ॥

इस प्रकार उसकी सारी सम्पत्ति जाती रही। न तो उसने धर्म ही कमाया और न भोग ही भोगे। इधर उसके सगे-सम्बन्धियोंने भी उसकी ओरसे मुँह मोड़ लिया। अब उसे बड़ी भयानक चिन्ताने घेर लिया ॥ १२ ॥

तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत् ॥ १३ ॥

धनके नाशसे उसके हृदयमें बड़ी जलन हुई। उसका मन खेदसे भर गया। आँसुओंके कारण गला रुँध गया। परन्तु इस तरह चिन्ता करते-करते ही उसके मनमें संसारके प्रति महान् दुःखबुद्धि और उत्कट वैराग्यका उदय हो गया ॥ १३ ॥

स चाहेदमहो कष्टं वृथात्मा मेऽनुतापितः।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृशः ॥ १४ ॥

अब वह ब्राह्मण मन-ही-मन कहने लगा—हाय! हाय!! बड़े खेदकी बात है, मैंने इतने दिनोंतक अपनेको व्यर्थ ही इस प्रकार सताया। जिस धनके लिये मैंने सरतोड़ परिश्रम किया, वह न तो धर्मकर्ममें लगा और न मेरे सुखभोगके ही काम आया ॥ १४ ॥

प्रायेणार्थाः कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च ॥ १५ ॥

प्रायः देखा जाता है कि कृपण पुरुषोंको धनसे कभी सुख नहीं मिलता। इस लोकमें तो वे धन कमाने और रक्षाकी चिन्तासे जलते रहते हैं और मरनेपर धर्म न करनेके कारण नरकमें जाते हैं ॥ १५ ॥

* भिक्षुगीता * ८९

यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥ १६॥
जैसे थोड़ा-सा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही तनिक-सा भी लोभ यशस्वियोंके शुद्ध यश और गुणियोंके प्रशंसनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥ १६॥
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥ १७॥
धन कमानेमें, कमा लेनेपर उसको बढ़ाने, रखने एवं खर्च करनेमें तथा उसके नाश और उपभोगमें—जहाँ देखो वहीं निरन्तर परिश्रम, भय, चिन्ता और भ्रमका ही सामना करना पड़ता है॥ १७॥
स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।
भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८॥
एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।
तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥ १९॥
चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अविश्वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जुआ और शराब—ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनके कारण ही माने गये हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थके विरोधी अर्थनामधारी अनर्थको दूरसे ही छोड़ दे॥ १८-१९॥
भिद्यन्ते भ्रातरो दाराः पितरः सुहृदस्तथा।
एकास्निग्धाः काकिणिना सद्यः सर्वेऽरयः कृताः॥ २०॥
भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र, माता-पिता, सगे-सम्बन्धी—जो स्नेहबन्धनसे बँधकर बिलकुल एक हुए रहते हैं—सब-के-सब कौड़ीके कारण इतने फट जाते हैं कि तुरंत एक-दूसरेके शत्रु बन जाते हैं॥ २०॥
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम्॥ २१॥
ये लोग थोड़े-से धनके लिये भी क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते हैं।

९० * गीता-संग्रह *


बात-की-बातमें सौहार्द-सम्बन्ध छोड़ देते हैं, लाग-डाँट रखने लगते हैं और एकाएक प्राण लेने-देनेपर उतारू हो जाते हैं। यहाँतक कि एक-दूसरेका सर्वनाश कर डालते हैं॥ २१॥

लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२॥

देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥

स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३॥

यह मनुष्यशरीर मोक्ष और स्वर्गका द्वार है, इसको पाकर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य है, जो अनर्थोंके धाम धनके चक्करमें फँसा रहे॥ २३॥

देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्च भागिनः।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः॥ २४॥

जो मनुष्य देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति-भाई, कुटुम्बी और धनके दूसरे भागीदारोंको उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह यक्षके समान धनकी रखवाली करनेवाला कृपण तो अवश्य ही अधोगतिको प्राप्त होता है॥ २४॥

व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५॥

मैं अपने कर्तव्यसे च्युत हो गया हूँ। मैंने प्रमादमें अपनी आयु, धन और बल-पौरुष खो दिये। विवेकीलोग जिन साधनोंसे मोक्षतक प्राप्त कर लेते हैं, उन्हींको मैंने धन इकट्ठा करनेकी व्यर्थ चेष्टामें