भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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८२ * गीता-संग्रह *


इति ते कथितो राजन् प्रसादाद्योग उत्तमः।
साङ्गोपाङ्गः सविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय॥ ३५॥
प्रिय राजन्! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग-उपांगसहित विस्तार-पूर्वक अनादि सिद्धयोगका वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है॥ ३५॥

युंक्ष्व योगं मयाख्यातं नाख्यातं कस्यचिन्नृप।
गोपयैनं ततः सिद्धिं परां यास्यस्यनुत्तमाम्॥ ३६॥
हे राजन्! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे॥ ३६॥

व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नस्य महात्मनः।
गणेशस्य वरेण्यः स चकार च यथोदितम्॥ ३७॥
व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके अनुसार आचरण किया॥ ३७॥

त्यक्त्वा राज्यं कुटुम्बं च कान्तारं प्रययौ रयात्।
उपदिष्टं यथा योगमास्थाय मुक्तिमाप्तवान्॥ ३८॥
राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वह वनको चला गया और उपदेश किये गये योगमें स्थित होकर मुक्त हो गया॥ ३८॥

इमं गोप्यतमं योगं शृणोति श्रद्धया तु यः।
सोऽपि कैवल्यमाप्नोति यथा योगी तथैव सः॥ ३९॥
इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार योगी होते हैं॥ ३९॥

य इमं श्रावयेद्योगं कृत्वा स्वार्थं सुबुद्धिमान्।
यथा योगी तथा सोऽपि परं निर्वाणमृच्छति॥ ४०॥
जो बुद्धिमान् इस योगको स्वयं प्राप्त करके दूसरोंको सुनाता है, वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है॥ ४०॥