गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ८१
प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय-व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥
दाढर्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम्।
शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम्॥ ३०॥
प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम्।
पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम्॥ ३१॥
दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म हैं॥ ३०-३१॥
नानावस्तुक्रयो भूमेः कर्षणं रक्षणं गवाम्।
त्रिधा कर्माधिकारित्वं वैश्यकर्म समीरितम्॥ ३२॥
अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय-विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं॥ ३२॥
दानं द्विजानां शुश्रूषा सर्वदा शिवसेवनम्।
एतादृशं नरव्याघ्र कर्म शौद्रमुदीरितम्॥ ३३॥
दान, ब्राह्मणोंकी सेवा, सदा शिवजीकी उपासना, हे राजन्! यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३३॥
स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः।
मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप॥ ३४॥
हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥