भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

७८ * गीता-संग्रह *

नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है ॥ ११ ॥

तेषु वेत्ति पृथग्भूतं विविधं भावमाश्रितः।
मामव्ययं च तज्ज्ञानं राजसं परिकीर्तितम् ॥ १२ ॥

जो अनेक उन भूतोंसे मुझे पृथक् भावका आश्रय लेकर और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजस है ॥ १२ ॥

हेतुहीनमसत्यं च देहात्मविषयं च यत्।
असदल्पार्थविषयं तामसं ज्ञानमुच्यते ॥ १३ ॥

हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका नाम तामस है ॥ १३ ॥

भेदतस्त्रिविधं कर्म विद्धि राजन् मयेरितम्।
कामनाद्वेषदम्भैर्यद्रहितं नित्यकर्म यत्।
कृतं विना फलेच्छां यत्कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ १४ ॥

हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ, सुनो, कामना, द्वेष और दम्भरहित जो नित्य कर्म है और फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है ॥ १४ ॥

यद्बहुक्लेशतः कर्म कृतं यच्च फलेच्छया।
क्रियमाणं नृभिर्दम्भात्कर्म राजसमुच्यते ॥ १५ ॥

अनपेक्ष्य स्वशक्तिं यदर्थक्षयकरं च यत्।
अज्ञानात्क्रियमाणं यत्कर्म तामसमीरितम् ॥ १६ ॥

जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है ॥ १५-१६ ॥