गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ७७
जाता है, वह राजसी तप है ॥ ५ ॥ तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः। परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥ राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको देनेवाला है और जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह तामस तप कहा गया है ॥ ६ ॥ विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः। श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥ ७ ॥ विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है ॥ ७ ॥ उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः। क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥ ८ ॥ उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है ॥ ८ ॥ अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत्। असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥ ९ ॥ जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है ॥ ९ ॥ ज्ञानं च त्रिविधं राजन् शृणुष्व स्थिरचेतसा। त्रिधा कर्म च कर्तारं ब्रवीमि ते प्रसङ्गतः ॥ १० ॥ हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ ॥ १० ॥ नानाविधेषु भूतेषु मामेकं वीक्षते तु यः। नाशवत्सु च नित्यं मां तज्ज्ञानं सात्त्विकं नृप ॥ ११ ॥ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही देखता है तथा