गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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- गीता-संग्रह *
ग्यारहवाँ अध्याय
तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा
श्रीगजानन उवाच
तपोऽपि त्रिविधं राजन् कायिकादिप्रभेदतः।
ऋजुतार्जवशौचानि ब्रह्मचर्यमहिंसनम्॥ १ ॥
गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम्।
स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम्॥ २ ॥
श्रीगणेशजी बोले— हे राजन्! कायिक, वाचिक और मानसिक—इन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु-पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है॥ १-२॥
मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम्।
अधीतिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम्॥ ३ ॥
मर्मस्पर्शी प्रिय वचन बोलना, उद्वेगरहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद-शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है॥ ३ ॥
अन्तःप्रसादः शान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः।
निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम्॥ ४ ॥
अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है॥ ४ ॥
अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत्।
ऋद्ध्यै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः॥ ५ ॥
निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है, वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त तथा दम्भसहित जो किया