भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80
  • गणेशगीता * ७९

कर्तारं त्रिविधं विद्धि कथ्यमानं मया नृप ॥ १७ ॥
धैर्योत्साही समोऽसिद्धौ सिद्धौ चाविक्रियस्तु यः।
अहङ्कारविमुक्तो यः स कर्ता सात्त्विको नृप ॥ १८ ॥
इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है ॥ १७-१८ ॥

कुर्वन् हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः।
अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते ॥ १९ ॥
जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसा और फलमें इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है ॥ १९ ॥

प्रमादाज्ञानसहितः परोच्छेदपरः शठः।
अलसस्तर्कवान् यस्तु कर्तासौ तामसो मतः ॥ २० ॥
प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा जाता है ॥ २० ॥

सुखं च त्रिविधं राजन् दुःखं च क्रमशः शृणु।
सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च मयोच्यते ॥ २१ ॥
हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ ॥ २१ ॥

विषवद्भासते पूर्वं दुःखस्यान्तकरं च यत्।
इच्छमानं तथा वृत्त्या यदन्तेऽमृतवद्भवेत्।
प्रसादात्स्वस्य बुद्धेर्यत्सात्त्विकं सुखमीरितम् ॥ २२ ॥
जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु दुःखका अन्त करनेवाला हो और मनोवृत्तिसे इच्छा किया हुआ जो अन्तमें अमृतके समान हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है ॥ २२ ॥