भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

२८ * गीता-संग्रह *


वरेण्य उवाच

पुमान् यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते।
अकाङ्क्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥

वरेण्यने कहा—हे गणेशजी ! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं करता हुआ भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है ? ॥ ३६ ॥

श्रीगजानन उवाच

कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ।
नयन्तौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ॥ ३७ ॥

श्रीगणेशजी बोले—रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्हीं दोनोंको तुम महान् शत्रु जानो ॥ ३७ ॥

आवृणोति यथा माया जगद्वाष्पो जलं यथा।
वर्षामेघो यथा भानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ॥ ३८ ॥

जिस प्रकार माया जगत्‌को ढकती है, जैसे भाप जलको और जैसे वर्षाकालका मेघ सूर्यको ढक लेता है, इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥

प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा।
इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ॥ ३९ ॥

महाबली, सदैव द्वेष करनेवाले और कभी पूरा न हो सकनेवाले इस इच्छारूप कामने ही बुद्धिमानोंके ज्ञानको भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥

आश्रित्य बुद्धिमणसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति।
तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥ ४० ॥

यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंके आश्रित होकर रहता है, उन्हींसे ज्ञानको आच्छादित करके यह ज्ञानियोंको भी मोहित करता है ॥ ४० ॥