गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
२८ * गीता-संग्रह *
वरेण्य उवाच
पुमान् यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते।
अकाङ्क्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥
वरेण्यने कहा—हे गणेशजी ! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं करता हुआ भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है ? ॥ ३६ ॥
श्रीगजानन उवाच
कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ।
नयन्तौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ॥ ३७ ॥
श्रीगणेशजी बोले—रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्हीं दोनोंको तुम महान् शत्रु जानो ॥ ३७ ॥
आवृणोति यथा माया जगद्वाष्पो जलं यथा।
वर्षामेघो यथा भानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार माया जगत्को ढकती है, जैसे भाप जलको और जैसे वर्षाकालका मेघ सूर्यको ढक लेता है, इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥
प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा।
इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ॥ ३९ ॥
महाबली, सदैव द्वेष करनेवाले और कभी पूरा न हो सकनेवाले इस इच्छारूप कामने ही बुद्धिमानोंके ज्ञानको भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥
आश्रित्य बुद्धिमणसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति।
तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥ ४० ॥
यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंके आश्रित होकर रहता है, उन्हींसे ज्ञानको आच्छादित करके यह ज्ञानियोंको भी मोहित करता है ॥ ४० ॥
* गणेशगीता * २९
तस्मान्नियम्य तान्यादौ स मनांसि नरो जयेत्।
ज्ञानविज्ञानयोः शान्तिकरं पापं मनोभवम्॥ ४१ ॥
अतः पहले मनके सहित इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाश करनेवाले इस मनोद्भव पापी कामको जीतना चाहिये॥ ४१ ॥
यतस्तानि पराण्याहुस्तेभ्यश्च परं मनः।
ततोऽपि हि परा बुद्धिरात्मा बुद्धेः परो मतः॥ ४२ ॥
स्थूल देहसे इन्द्रियाँ परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धिसे परे आत्मा है॥ ४२ ॥
बुद्ध्वैवमात्मनात्मानं संस्तभ्यात्मानमात्मना।
हत्वा शत्रुं कामरूपं परं पदमवाप्नुयात्॥ ४३ ॥
इस प्रकार बुद्धिसे आत्माको जानकर, बुद्धिसे ही मनको स्थिर करके कामरूपी शत्रुको मारकर परम पदको प्राप्त करना चाहिये॥ ४३ ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां कर्मयोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
ज्ञानयोग
श्रीगजानन उवाच
पुरा सर्गादिसमये त्रैगुण्यं त्रितनूरुहम्।
निर्माय चैनमवदं विष्णवे योगमुत्तमम्॥ १ ॥
**श्रीगणेशजी बोले—**पूर्वकालमें सृष्टि उत्पन्न करनेके समय तीन गुणोंसे युक्त तीन शरीरमें रहनेवाले उत्तम योगका निर्माण करके मैंने विष्णुसे इसका वर्णन किया था॥ १ ॥
अर्यम्णे सोऽब्रवीत्सोऽपि मनवे निजसूनवे।
ततः परम्परायातं विदुरेनं महर्षयः॥ २ ॥
विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा। सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे
३० * गीता-संग्रह *
कहा। इसके उपरान्त परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षिगण जानते रहे ॥ २ ॥
कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे। अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥ ३ ॥
हे राजन्! कलियुगमें यह बहुत काल बीत जानेसे नष्ट हो गया तथा इसे श्रद्धा-विश्वासके अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया ॥ ३ ॥
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात्। गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥
अब फिर तुमने मेरे मुखसे इस पुरातन योगको सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच
साम्प्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन। प्रोक्तवान् कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ ५ ॥
राजा वरेण्य बोले—हे गजानन! आप तो इस समय गर्भसे उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णुसे यह उत्तम योग किस प्रकारसे वर्णन किया ? ॥ ५ ॥
गणेश उवाच
अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च। संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥ ६ ॥
गणेशजी बोले—[हे राजन्!] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते ॥ ६ ॥
मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः। मय्येव लयं यान्ति प्रलयेषु युगे युगे ॥ ७ ॥
हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ७ ॥
* गणेशगीता * ३१
अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च।
अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ ८॥
मैं ही श्रेष्ठ ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ॥ ८॥
अजोऽव्ययोऽहं भूतात्मानादिरीश्वर एव च।
आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु॥ ९॥
मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ॥ ९॥
अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत्।
साधून् संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम्॥ १०॥
जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ॥ १०॥
उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च।
हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा॥ ११॥
मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका स्थापन करता हूँ और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनन्दसे दुष्टों तथा दैत्योंका वध करता हूँ॥ ११॥
वर्णाश्रमान् मुनीन् साधून् पालये बहुरूपधृक्।
एवं यो वेत्ति सम्भूतिर्मम दिव्या युगे युगे॥ १२॥
तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः।
त्यक्त्वाहं ममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते॥ १३॥
अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओंका पालन करता हूँ, इस प्रकारसे जो युग-युगमें मेरी दिव्य विभूतिको, मेरे कर्म, वीर्य और रूपको जानता है तथा अहंकार और ममताबुद्धिका त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है॥ १२-१३॥
३२ * गीता-संग्रह *
निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्व्यपाश्रयाः। विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः॥१४॥
इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करनेवाले विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक प्राणी मुझको प्राप्त हो गये हैं॥१४॥
येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः। तथा तथा फलं तेभ्यः प्रयच्छाम्यव्ययः स्फुटम्॥१५॥
श्रेष्ठजन जिस-जिस भावसे मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनश्वर उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ॥१५॥
जनाः स्युरितरे राजन् मम मार्गानुयायिनः। तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते॥१६॥
हे राजन्! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं॥१६॥
कुर्वन्ति देवताप्रीतिं काङ्क्षन्तः कर्मणां फलम्। प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम्॥१७॥
जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है॥१७॥
चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोऽशतः। कर्माशितश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयानघ॥१८॥
हे पापरहित! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व, रज, तम—इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है॥१८॥
कर्तारमपि तेषां मामकर्तारं विदुर्बुधाः। अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः॥१९॥
यद्यपि मैं इनका कर्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते
- गणेशगीता * ३३
हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं ॥ १९ ॥
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम्।
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वं पूर्वं मुमुक्षवः ॥ २० ॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्वमें मुमुक्षुजन कर्म करते थे ॥ २० ॥
वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ।
अज्ञानबन्धनाजन्तुर्बुद्ध्वाय मुच्यतेऽखिलात् ॥ २१ ॥
वासना जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव।
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥ २२ ॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जाननेमें बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोहको प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥
तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम्।
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिः प्रिय ॥ २३ ॥
हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्मका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥
क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः।
यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ २४ ॥
क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥
३४ * गीता-संग्रह *
कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यारहभेन्नरः।
तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम्॥ २५॥
जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं॥ २५॥
फलतृष्णां विहाय स्यात्सदा तृप्तो विसाधनः।
उद्युक्तोऽपि क्रियां कर्तुं किञ्चिन्नैव करोति सः॥ २६॥
जो फलकी इच्छाको छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करनेमें लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं॥ २६॥
निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः।
केवलं वै गृहं कर्माचरन्नायाति पातकम्॥ २७॥
जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता॥ २७॥
अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्च यः।
यथा प्राप्येऽहं सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते॥ २८॥
जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते॥ २८॥
अखिलैर्विषयैर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानवानपि।
यज्ञार्थं तस्य सकलं कृतं कर्म विलीयते॥ २९॥
सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणीके सारे कर्म यज्ञ ही हैं और उसकी सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं॥ २९॥
- गणेशगीता * ३५
अहमग्निर्हविर्होता हुतं यन्मयि चार्पितम्।
ब्रह्माप्तव्यं च तेनाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः॥ ३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाले और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है वह, सब मैं ही हूँ। इसे ब्रह्मस्वरूपसे देखकर जो हवन करता है, वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही लगा है॥ ३०॥
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदन्ति च।
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे॥ ३१॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं॥ ३१॥
संयमाग्नौ परे भूप इन्द्रियाण्युपजुह्वति।
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥ ३२॥
हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं॥ ३२॥
प्राणानामिन्द्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः।
निजामरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति॥ ३३॥
कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं॥ ३३॥
द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन।
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजन्ति माम्॥ ३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं॥ ३४॥
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपन्ति ये।
रुद्धा गतीश्चोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः॥ ३५॥
जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें
३६ * गीता-संग्रह *
हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३५ ॥
जित्वा प्राणान् प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च।
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥
नित्यं ब्रह्म प्रयान्त्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः।
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यः कुतो भवेत् ॥ ३७ ॥
दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकारके यज्ञोंमें निरत योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा? ॥ ३६-३७ ॥
कायिकादि त्रिधाभूतान् यज्ञान् वेदे प्रतिष्ठितान्।
ज्ञात्वा तानखिलान् भूप मोक्ष्यसेऽखिलबन्धनात् ॥ ३८ ॥
हे राजन्! वेदोंमें मन, वचन, कर्मके बहुत प्रकारके यज्ञ वर्णित हैं, उन्हें पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥
सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः।
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ ३९ ॥
हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥
तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम्।
शुश्रूषया वदिष्यन्ति सन्तस्तत्त्वविशारदाः ॥ ४० ॥
हे पुरुषश्रेष्ठ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन तुम्हें शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥
नानासङ्गाज्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम्।
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करता है, पर किसी साधुकी
- गणेशगीता * ३७
संगति नहीं करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
सत्सङ्गाद्गुणसम्भूतिरापदां लय एव च।
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणोंकी प्राप्ति और आपदाका नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥
इतरत्सुलभं राजन् सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥ ४३ ॥
हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है ॥ ४३ ॥
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवापि पश्यति।
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेपर यह सब प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। इससे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात्।
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात् ॥ ४५ ॥
जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप।
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥ ४६ ॥
हे राजन्! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्।
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ ४७ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको
३८ * गीता-संग्रह *
प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः।
तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः॥ ४८ ॥
जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥
आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम्।
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न ॥ ४९ ॥
हे राजन्! जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सभी सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योगमें स्थित होकर जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ ४९ ॥
ज्ञानखड्गप्रहारेण सम्भूतामज्ञतां बलात्।
छित्त्वान्तःसंशयं तस्माद्योगयुक्तो भवेन्नरः॥ ५० ॥
इस कारण ज्ञानरूपी खड्गसे मनके अज्ञान तथा संशयको बलपूर्वक काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना उचित है ॥ ५० ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां ज्ञानयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
संन्यासयोग
वरेण्य उवाच
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया।
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥ १ ॥
वरेण्य बोले— हे भगवन्! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् निष्कामभावसे कर्म करते-करते विशुद्ध चित्त होनेपर कर्मत्याग करने)-को ज्ञानका
- गणेशगीता * ३९
कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहते हैं, इन दोनोंमें जो हितकारी हो, उसे कहिये ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने।
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीगणेशजी बोले—(अधिकारियोंके भेदसे) कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्मसंन्याससे कर्मयोगमें विशेषता है॥ २॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न काङ्क्षति किञ्चन।
मुच्यते बन्धनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान् सुखम् ॥ ३ ॥
जो द्वन्द्व और दुःखको सहकर किसीसे द्वेष नहीं करता और किसी बातकी इच्छा नहीं करता, ऐसा प्राणी अनायास तत्काल कर्मबन्धनसे सदा मुक्त हो जाता है॥ ३॥
वदन्ति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसङ्ग्रहौ।
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं सयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको मूढ़ और अज्ञानी ही पृथक्-पृथक् कहते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही मानते हैं॥ ४॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम्।
सङ्ग्रहं कर्मणो योगं यो विन्दति स विन्दति ॥ ५ ॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है॥ ५॥
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः।
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पण्डितजन केवल कर्मके संन्यासको ही संन्यास नहीं कहते, यदि
४० * गीता-संग्रह *
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्म ही हो जाता है॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः।
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन् कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, मनको वशमें करनेवाले, जितेन्द्रिय, योगमें तत्पर और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेवाले कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥७॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते।
एकादशानीन्द्रियाणि कुर्वन्ति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वको जाननेवाला योगयुक्त आत्मवान् पुरुष 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा नहीं मानता, अपितु मनसहित एकादश इन्द्रियाँ कर्म करती हैं, ऐसा मानता है ॥८॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः।
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥९॥
जो कर्म करनेवाला सारे कर्म ब्रह्ममें अर्पण कर देता है, वह उसी प्रकार पाप-पुण्यसे लिप्त नहीं होता, जैसे जलमें पड़ा हुआ सूर्यका बिम्ब उससे लिप्त नहीं होता ॥९॥
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा।
त्यक्त्वाशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये ॥१०॥
योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त आशा (फलाशा)-का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे कर्म करते हैं ॥१०॥
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम्।
बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते ॥११॥
योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है, वह कर्मबीजसे बँध जाता है और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥
- गणेशगीता * ४१
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत्।
न कुर्वन् कारयन् वापि नन्दञ्च्वभ्रे सुपत्तने ॥ १२ ॥
न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया।
न क्रियाबीजसम्पर्कः शक्त्या तत्क्रियतेऽखिलम् ॥ १३ ॥
कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप।
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
योगीको उचित है कि मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर सुखसे रहे तथा उत्तम नगरमें आनन्दसे वास करता हुआ भी न कुछ करे, न कराये और ऐसा जाने कि न कोई क्रिया करता हूँ, न कोई कर्तृत्वपना मुझमें है, न मैं कोई निर्माण करता हूँ, न मेरा क्रियाके बीजसे सम्बन्ध है, यह सब कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है। हे राजन्! मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं करता हूँ, मोहसे मलिन बुद्धिवाले अज्ञानी ही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १२-१४ ॥
विवेकेनात्मनोऽज्ञानं येषां नाशितमात्मना।
तेषां विकाशमायाति ज्ञानमादित्यवत्परम् ॥ १५ ॥
जिन्होंने विवेकके द्वारा स्वयं ही अपना अज्ञान नष्ट किया है, उनका ज्ञान सूर्यके समान परम प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
मन्निष्ठा मद्धियोऽत्यन्तं मच्चित्ता मयि तत्पराः।
अपुनर्भवमायान्ति विज्ञानान्नाशितैनसः ॥ १६ ॥
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझमें ही है, जिनका चित्त मुझमें अत्यन्त आसक्त है और जो सदा मेरे परायण हैं, वे श्रेष्ठ ज्ञानद्वारा पापका नाश करके मुक्त हो जाते हैं ॥ १६ ॥
ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु।
समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि ॥ १७ ॥
महात्मा पण्डितजन ज्ञानविज्ञानयुक्त ब्राह्मण, गौ, हाथी आदि
४२ * गीता-संग्रह *
प्राणी, चाण्डाल और श्वान—इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं॥ १७॥
वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः।
यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम्॥ १८॥
जिनका मन समतामें स्थित है, वे जीवन्मुक्त संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं, कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समतायुक्त है, इस कारण वे ब्रह्ममें स्थित रहते हैं॥ १८॥
प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न।
ब्रह्माश्रिता असम्मूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः॥ १९॥
जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक नहीं करते, वे समत्वबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन ब्रह्ममें स्थित तथा ब्रह्मके जाननेवाले हैं॥ १९॥
वरेण्य उवाच
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु।
भगवन् कृपया तन्मे वद विद्याविशारद॥ २०॥
वरेण्य बोले— भगवन्! तीनों लोकों तथा देवता और गन्धर्व आदि योनियोंमें यथार्थ सुख क्या है ? हे विद्याविशारद! कृपाकर आप मुझसे यह वर्णन कीजिये॥ २०॥
श्रीगजानन उवाच
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि।
अविनाशि सुखं तद्वि न सुखं विषयादिषु॥ २१॥
श्रीगणेशजी बोले— जो अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसीका नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें (वास्तविक) सुख नहीं है॥ २१॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः।
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित्॥ २२॥
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख तो दुःखके ही कारण हैं और उत्पत्ति
* गणेशगीता * | ४३
तथा नाशवाले हैं। तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२ ॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः।
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥ २३ ॥
काम, क्रोध आदिका कारण उपस्थित रहनेपर भी जो उनके आवेगको रोक लेता है तथा शरीरके प्रति अनासक्त होकर उन्हें जीतनेका प्रयत्न करता है, वह बहुत कालतक सुख भोगता है ॥ २३ ॥
अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽन्तःसुखोऽन्तार्तिर्लभैत् ।
असन्दिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ॥ २४ ॥
जिनके हृदयमें निष्ठा है, ज्ञानका प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियोंका हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥
जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा।
तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ २५ ॥
जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है ॥ २५ ॥
आसनेषु समासीनस्त्यक्त्वेमान् विषयान् बहिः।
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ॥ २६ ॥
सब बाह्य विषयोंका त्यागकर एकान्तमें आसनमें स्थित हो, दृष्टिको भ्रूमध्यमें स्थिरकर प्राणायाम करे ॥ २६ ॥
प्राणायामं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम्।
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभूतं विपश्चितः ॥ २७ ॥
प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियोंने उसके तीन भेद कहे हैं ॥ २७ ॥
४४ * गीता-संग्रह *
प्रमाणं भेदतो विद्धि लघुमध्यममुत्तमम्।
दशभिर्द्व्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघुः स्मृतः॥ २८ ॥
प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम—तीन प्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहलाता है॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः।
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो य उत्तमः सोऽभिधीयते॥ २९ ॥
चौबीस अक्षरोंका मध्यम और छत्तीस अक्षरोंका उत्तम कहा जाता है॥ २९ ॥
सिंहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा।
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत्॥ ३० ॥
सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुको साधना चाहिये॥ ३० ॥
पीडयन्ति मृगांस्ते न लोकान् वश्यंगतान्नृप।
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धो न च तत्तनुम्॥ ३१ ॥
हे राजन्! जिस प्रकार अपने वशमें हुए सिंहादि मृगोंको सताते हैं, किंतु वशमें करनेवाले लोगोंको पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थिर होकर पापोंको भस्म करता है, परंतु शरीरको नहीं जलाता॥ ३१ ॥
यथा यथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत्।
तथा तथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित्॥ ३२ ॥
जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य सीढ़ियोंपर चढ़ता है, इसी प्रकार योगीके लिये क्रमसे प्राणापानको वशमें करना उचित है॥ ३२ ॥
- गणेशगीता * ४५
पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत्।
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥ ३३ ॥
* पूरक-कुम्भक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाता है॥ ३३॥
प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता।
योगस्तु धारणे द्वे स्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ॥ ३४ ॥
बारह उत्तम प्राणायामसे उत्तम धारणा होती है, दो धारणासे योग सिद्ध होता है, योगी निरन्तर धारणाका अभ्यास करे॥ ३४॥
एवं यः कुरुते राजंस्त्रिकालज्ञः स जायते।
अनायासेन तस्य स्याद्वश्यं लोकत्रयं नृप॥ ३५ ॥
हे राजन्! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकालका ज्ञान हो जाता है और अनायास त्रिलोकी उनके वशमें हो जाती है॥ ३५॥
ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि।
एवं योगश्च संन्यासः समानफलदायिनौ ॥ ३६ ॥
वह अपने अन्तरात्मामें सब जगत्को ब्रह्मरूप देखता है। इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फलके देनेवाले हैं॥ ३६॥
जन्तूनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम्।
मां ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नोति त्रैलोक्यस्येश्वरं विभुम् ॥ ३७ ॥
सब प्राणियोंके हितकारी और कर्मका फल देनेवाले एवं त्रिलोकीके व्यापक मुझ ईश्वरको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं॥ ३७॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां वैधसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
* पूरक—वायुको ऊपर खींचना, कुम्भक—वायुका रोध करना, रेचक—वायुका त्याग करना—ये तीन प्राणायामके अंग हैं।
४६ * गीता-संग्रह *
पाँचवाँ अध्याय
योगवृत्तिकी प्रशंसा
श्रीगजानन उवाच
श्रौतस्मार्तानि कर्माणि फलं नेच्छन् समाचरेत्।
शस्तः स योगी राजेन्द्र अक्रियायोगमाश्रितात्॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! जो श्रुति और स्मृतिमें कहे हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके करता है, वह योगी कर्मका त्याग करनेवाले योगियोंसे श्रेष्ठ है॥ १॥
योगप्राप्त्यै महाबाहो हेतुः कर्मैव मे मतम्।
सिद्धियोगस्य संसिद्धयै हेतुः शमदमौ मतौ॥ २॥
हे महाभुज! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही कारण है, योगसिद्धिकी सिद्धिके निमित्त शम और दम ही कारण हैं॥ २॥
इन्द्रियार्थांश्च सङ्कल्प्य कुर्वन् स्वस्य रिपुर्भवेत्।
एताननिच्छन् यः कुर्वन् सिद्धिं योगी च सिद्ध्यति॥ ३॥
इन्द्रियोंके विषयोंका संकल्पकर कर्म करनेवाला अपना शत्रु होता है और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है, वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है॥ ३॥
सुहृत्त्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बन्धने।
आत्मनैवात्मनो ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन॥ ४॥
एकमात्र आत्मा ही आत्माका मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है और यही अज्ञान होनेसे बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं॥ ४॥
मानेऽपमाने दुःखे च सुखे सुहृदि साधुषु।
मित्रेऽमित्रेऽप्युदासीने द्वेष्ये लोष्ठे च काञ्चने॥ ५॥
* गणेशगीता * ४७
समो जितात्मा विज्ञानी ज्ञानीन्द्रियजयावहः।
अभ्यसेत्सततं योगं यदा युक्ततमो हि सः॥ ६॥
मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टीके ढेले और सुवर्ण इत्यादिमें समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा सदा योगका अभ्यास करता रहे, जबतक कि उसको योगकी सिद्धि न हो जाय ॥ ५-६ ॥
तप्तः श्रान्तो व्याकुलो वा क्षुधितो व्यग्रचित्तकः।
कालेऽतिशीतेऽत्युष्णे वानिलाग्न्यम्बुसमाकुले ॥ ७ ॥
सध्वनावतिजीर्णे गोः स्थाने साग्नौ जलान्तिके।
कूपकूले श्मशाने च नद्यां भित्तौ च मर्मरे ॥ ८ ॥
चैत्ये सवल्मिके देशे पिशाचादिसमावृते।
नाभ्यसेद्योगविद्योगं योगध्यानपरायणः ॥ ९ ॥
जो संतप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जलकी अधिकतावाले देशमें, जिस स्थानमें ध्वनि अधिक हो, जो टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके निकट, श्मशान, नदी, दीवारके निकट तथा जहाँ शुष्क पर्णका शब्द सुनायी पड़ता हो, चैत्य वृक्षके नीचे, वल्मीक (बाँबी)-वाले स्थानमें और पिशाचादिसे युक्त स्थानमें योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे ॥ ७—९ ॥
स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मन्दता ज्वरः।
जडता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः ॥ १० ॥
स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर, जड़ता—ये सब दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥