गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वृत्रगीता * २३५
संहारकाले परिदग्धकाया ब्रह्माणमायान्ति सदा प्रजा हि। चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे ये ब्रह्मलोके अपराः स्म तेऽपि ॥ ५१ ॥
ज्ञानाग्निके द्वारा जिनके सूक्ष्म, स्थूल और कारणशरीर दग्ध हो गये हैं, वे प्रजाजन अर्थात् योगीलोग प्रलयकालमें सदा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं एवं जो ब्रह्मलोकसे नीचेके लोकोंमें रहनेवाले साधनशील दैवी प्रकृतिसे सम्पन्न साधक हैं, वे सब परब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं॥ ५१ ॥
प्रजाविसर्गं तु सशेषकाले स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः। निःशेषतस्तत्पदं यान्ति चान्ते सर्वे देवा ये सदृशा मनुष्याः॥ ५२ ॥
प्रलयकालमें जो जीव देवभावको प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलोंका उपभोग समाप्त करनेसे पहले ही लयको प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तरमें पुनः प्रजाकी सृष्टि होनेपर वे शेष फलका उपभोग करनेके लिये उन्हीं स्थानोंको प्राप्त होते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्पमें प्राप्त थे; किंतु जो कल्पान्तमें उस योनिसम्बन्धी कर्मफल-भोगको पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोकका नाश हो जानेपर दूसरे कल्पमें उनके जैसे कर्म हैं, उसीके सदृश अन्य प्राणियोंकी भाँति मनुष्य-योनिको ही प्राप्त होते हैं॥ ५२ ॥
ये तु च्युताः सिद्धलोकात् क्रमेण तेषां गतिं यान्ति तथानुपूर्व्या। जीवाः परे तद् बलतुल्यरूपाः स्वं स्वं विधिं यान्ति विपर्ययेण॥ ५३ ॥
जो योगी सिद्धलोकसे गिरकर मृत्युलोकमें आये हैं, उनके समान