गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ * गीता-संग्रह *
साधनबलसे सम्पन्न जो अन्य योगी हैं, वे भी एक लोकसे दूसरे लोकमें ऊपर उठते हुए क्रमशः उन सिद्ध पुरुषोंकी ही गतिको प्राप्त होते हैं। परंतु जो वैसे नहीं हैं, वे विपरीतभावके कारण अपनी-अपनी गतिको प्राप्त होते हैं॥ ५३ ॥
स यावदेवास्ति सशेषभुक् ते प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले। तावत् तदङ्गेषु विशुद्धभावः संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत्॥ ५४॥
विशुद्धभावसे सम्पन्न सिद्ध पुरुष जबतक पंचेन्द्रियरूप इस करणसमुदायका संयम करके शेष प्रारब्ध कर्मका उपभोग करता है, तबतक उसके शरीरमें समस्त प्रजागणोंका अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंका तथा अपरा और परा विद्याका निवास रहता है॥ ५४॥
शुद्धां गतिं तां परमां परैति शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन्। ततोऽव्ययं स्थानमुपैति ब्रह्म दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै॥ ५५॥
जो साधक सदा शुद्ध मनसे उस विशुद्ध परमगतिका अनुसन्धान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त करके वह उसीमें प्रतिष्ठित हो जाता है॥ ५५॥
इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व नारायणस्येह बलं मया ते॥ ५६॥
उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायणका बल एवं प्रभाव बताया है॥ ५६॥