गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ * गीता-संग्रह *
हंस उवाच
स्वाध्याय एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते।
असाधुत्वं परीवादो मृत्युर्मानुष्यमुच्यते॥ ४४॥
**हंसने कहा—**साध्यगण! वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंका देवत्व है। उत्तम व्रतोंका पालन करना ही उनमें साधुता बतायी जाती है। दूसरोंकी निन्दा करना ही उनकी असाधुता है और मृत्युको प्राप्त होना ही उनकी मनुष्यता बतायी गयी है॥ ४४॥
भीष्म उवाच
( इत्युक्त्वा परमो देवो भगवान् नित्य अव्ययः।
साध्यैर्देवगणैः सार्धं दिवमेवारुरोह सः॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नित्य अविनाशी परमदेव भगवान् ब्रह्मा साध्य देवताओंके साथ ही ऊपर स्वर्गलोककी ओर चल दिये।
एतद् यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्ग्याय च ध्रुवम्।
दर्शितं देवदेवेन परमेणाव्ययेन च॥)
सर्वश्रेष्ठ अविनाशी देवाधिदेव ब्रह्माजीके द्वारा प्रकाशमें लाया हुआ यह पुण्यमय तत्त्वज्ञान यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है तथा यह स्वर्गलोककी प्राप्तिका निश्चित साधन है।
संवाद इत्ययं श्रेष्ठः साध्यानां परिकीर्तितः।
क्षेत्रं वै कर्मणां योनिः सद्भावः सत्यमुच्यते॥ ४५॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार साध्योंके साथ जो हंसका संवाद हुआ था, उसका मैंने तुमसे वर्णन किया। यह शरीर ही कर्मोंकी योनि है और सद्भावको ही सत्य कहते हैं॥ ४५॥
॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हंसगीता सम्पूर्णा॥