भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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नारदगीता

[महाभारतके शान्तिपर्वमें तीन अध्यायवाली नारदगीता प्राप्त होती है। इसमें देवर्षि नारदद्वारा श्रीशुकदेवजीको ज्ञान तथा वैराग्यका उपदेश दिया गया है तथा इसी क्रममें सदाचारकी प्रेरणा देते हुए धैर्य तथा अनासक्तिपर विशेष बल दिया गया है। तदनन्तर मनुष्यको प्रारब्धानुसार प्राप्त सुख-दुःख आदिका वर्णन है। प्रारब्ध स्वयं उसीके पूर्वकृत कर्मोंके परिणामस्वरूप बनता है तथा मनुष्य परवश-सा होकर उन्हें भोगनेको विवश होता है। अतः अहंबुद्धिका सर्वथा त्याग करके, बन्धनमुक्त हो सनातन-पदको प्राप्त करना चाहिये। यही तथ्य इस गीतामें बहुत रोचक ढंगसे बताया गया है। इसकी भाषा अत्यन्त सुबोध, दृष्टान्त अत्यन्त रोचक तथा उपदेश सभीके लिये उपयोगी है। सहज बोधगम्य इस नारदगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]

पहला अध्याय

शुकदेवजीको नारदजीद्वारा वैराग्य और ज्ञानका उपदेश देना

भीष्म उवाच

एतस्मिन्नन्तरे शून्ये नारदः समुपागमत्।
शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान् वक्तुमीप्सितान्॥ १॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! व्यासजीके चले जानेके बाद उस सूने आश्रममें स्वाध्यायपरायण शुकदेवसे अपना इच्छित वेदोंका अर्थ कहनेके लिये देवर्षि नारदजी पधारे॥ १॥

देवर्षिं तु शुको दृष्ट्वा नारदं समुपस्थितम्।
अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजयत्॥ २॥

देवर्षि नारदको उपस्थित देखकर शुकदेवने वेदोक्त विधिसे अर्घ्य