गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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को जानता है और समस्त चेतन प्राणियोंमें चैतन्यको समानरूपसे व्याप्त देखता है, वह सम्पूर्ण परमपदके अनुसन्धानमें संलग्न हो जगत्के भोगोंसे विरक्त हो जाता है। साधुशिरोमणे ! उस वैराग्यवान् पुरुषके लिये जो हितकर उपदेश है, उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ॥ ३३-३४ ॥
शाश्वतस्याव्ययस्याथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम्।
प्रोच्यमानं मया विप्र निबोधेदमशेषतः ॥ ३५ ॥
उसके लिये जो सनातन अविनाशी परमात्माका उत्तम ज्ञान अभीष्ट है, उसका मैं वर्णन करता हूँ। विप्रवर ! तुम सारी बातोंको ध्यान देकर सुनो ॥ ३५ ॥
॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन
ब्राह्मण उवाच
यः स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन्।
पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद् भवेत् ॥ १ ॥
**सिद्ध ब्राह्मणने कहा—**काश्यप ! जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंमेंसे क्रमशः) पूर्व-पूर्वका अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौनभावसे रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान—परब्रह्म परमात्मामें लीन रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त होता है ॥ १ ॥
सर्वमित्रः सर्वसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः।
व्यपेतभयमन्युश्च आत्मवान् मुच्यते नरः ॥ २ ॥
जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, मनोनिग्रहमें तत्पर, जितेन्द्रिय, भय और क्रोधसे रहित तथा आत्मवान् है, वह मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥