भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • उत्तरगीता * ३६३

आत्मवत् सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः। अमानी निरभीमानः सर्वतो मुक्त एव सः॥ ३ ॥ जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियोंके प्रति अपने-जैसा बर्ताव करता है, जिसके भीतर सम्मान पानेकी इच्छा नहीं है तथा जो अभिमानसे दूर रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है॥ ३॥

जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च। लाभालाभे प्रियद्वेष्ये यः समः स च मुच्यते॥ ४॥ जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय-अप्रिय आदि द्वन्द्वोंको समभावसे देखता है, वह मुक्त हो जाता है॥ ४॥

न कस्यचित् स्पृहयते नावजानाति किञ्चन। निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः॥ ५॥ जो किसीके द्रव्यका लोभ नहीं रखता, किसीकी अवहेलना नहीं करता, जिसके मनपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता और जिसके चित्तकी आसक्ति दूर हो गयी है, वह सर्वथा मुक्त ही है॥ ५॥

अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित्। त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी च मुच्यते॥ ६॥ जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या सन्तान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है॥ ६॥

नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायकः। धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते॥ ७॥ जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसञ्चित कर्मोंको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है॥ ७॥