गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० * गीता-संग्रह *
इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन।
पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम्॥ ३८॥
मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा—॥ ३८॥
भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते।
कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः॥ ३९॥
यह बारम्बार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है?॥ ३९॥
तथा मांसं च मेदश्च स्नाव्यस्थीनि च योषिति।
कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्॥ ४०॥
वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम्।
निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक् पृथक्॥ ४१॥
स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हड्डियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्-पृथक् निःसारण कैसे होता है?॥ ४०-४१॥
कुतो वायं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः।
कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि॥ ४२॥
यह जीव कैसे श्वास लेता, कैसे उच्छ्वास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है?॥ ४२॥
जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम्।
किंवर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै पुनः॥ ४३॥
याथातथ्येन भगवन् वक्तुमर्हसि मेऽनघ।
चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है?