गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * उत्तरगीता * | ३७१ |
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फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है। निष्पाप भगवन्! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ ४३ १/२ ॥
इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥ ४४ ॥
प्रत्युब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिन्दम ।
शत्रुदमन महाबाहु माधव ! उस ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर मैंने जैसा सुना था, वैसा ही उसे बताया ॥ ४४ १/२ ॥
यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत् ॥ ४५ ॥
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलैः ।
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत् ॥ ४६ ॥
जैसे घरका सामान अपने कोठेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चञ्चल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसन्धान करे और प्रमादको त्याग दे ॥ ४५-४६ ॥
एवं सततमुद्युक्तः प्रीतात्मा नचिरादिव ।
आसादयति तद् ब्रह्म यद् दृष्ट्वा स्यात् प्रधानवित् ॥ ४७ ॥
इस प्रकार सदा ध्यानके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, जिसका साक्षात्कार करके मनुष्य प्रकृति एवं उसके विकारोंको स्वतः जान लेता है ॥ ४७ ॥
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः ।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते ॥ ४८ ॥
उस परमात्माका इन चर्मचक्षुओंसे दर्शन नहीं हो सकता; सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी उसको ग्रहण नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे ही उस महान् आत्माका दर्शन होता है ॥ ४८ ॥