गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ * गीता-संग्रह *
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ४९ ॥ वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, मुख और सिरवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ४९ ॥
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति। स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम् ॥ ५० ॥ आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव। तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि ॥ ५१ ॥ तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करके—उसकी पृथक्ताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है) ॥ ५०-५१ ॥
इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्तं द्विजोत्तम। आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम् ॥ ५२ ॥ द्विजश्रेष्ठ ! यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब मैं जानेकी अनुमति चाहता हूँ। विप्रवर! तुम भी सुखपूर्वक अपने स्थानको लौट जाओ ॥ ५२ ॥
इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः। अगच्छत यथाकामं ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ५३ ॥ श्रीकृष्ण! मेरे इस प्रकार कहनेपर वह कठोर व्रतका पालन