गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- रामगीता (२) * ४२३
वेतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः।
ईशानः सर्वभक्तानां सोऽपि तिष्ठेन्ममाज्ञया ॥ २४ ॥
वेताल और भूतगणोंके स्वामी, सभी भक्तोंको भोग (इष्ट) फल प्रदान करनेवाले ईशानदेव भी मेरी आज्ञामें ही रहते हैं॥ २४॥
यो वामदेवोऽङ्गिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः।
रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ २५ ॥
अंगिराके शिष्य और रुद्रगणोंके प्रमुख जो योगियोंके संरक्षक हैं, वे वामदेव नित्य मेरी आज्ञाका अनुसरण करते हैं॥ २५॥
यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः।
विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात्किल ॥ २६ ॥
जो सम्पूर्ण संसारके [प्रथम] पूज्य और विघ्नराज हैं, वे धर्माध्यक्ष विनायक भी मेरे वचनोंके अधीन हैं॥ २६॥
योऽपि वेदविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः।
स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयम्भूप्रतिचोदितः ॥ २७ ॥
जो वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ देवसेनापति भगवान् स्कन्द हैं, वे भी सदा [मुझ] स्वयम्भूसे ही प्रेरित होते हैं॥ २७॥
ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः।
सृजन्ति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ॥ २८ ॥
जो मरीचि आदि महर्षि प्रजापतिरूपसे विविध लोकोंको उत्पन्न करते हैं, वे [मुझ] परमेश्वरकी आज्ञाके अधीन ही ऐसा करते हैं॥ २८॥
या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम्।
पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात् ॥ २९ ॥
जो भगवती लक्ष्मी सभी प्राणियोंको महान् ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वे नारायणकी अर्धांगिनी मेरे अनुग्रहसे ही ऐसा करती हैं॥ २९॥
वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता सम्प्रवर्तते ॥ ३० ॥
जो देवी सरस्वती वाणीका विशद वैभव प्रदान करती हैं, वे