भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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४२४ * गीता-संग्रह *


भी [मुझ] परमेश्वरकी प्रेरणासे ही ऐसा करती हैं॥ ३०॥
याशेषपुरुषान् घोरान्नरकात्तारयत्यपि।
सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी ॥ ३१ ॥
जो स्मरण करनेपर समस्त (धार्मिक) पुरुषोंको नरकोंसे बचाती हैं, वे देवी सावित्री भी [मुझ] भगवान्‌की ही आज्ञानुवर्तिनी हैं॥ ३१॥
पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी।
यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्वचनानुगा ॥ ३२ ॥
परादेवी पार्वती, जो ध्यान करनेपर विशिष्ट ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाली हैं, वे भी मेरे वचनकी अनुगामिनी हैं॥ ३२॥
योऽनन्तो महिमानन्तः शेषोऽशेषामरप्रभुः ।
दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः ॥ ३३ ॥
जो अनन्त महिमाशाली देवश्रेष्ठ शेष सम्पूर्ण लोकोंको अपने मस्तकपर धारण करते हैं, वे भी [मुझ] परमात्माके अधीन हैं॥ ३३॥
योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः।
पिबत्यखिलमम्भोधिमीश्वरस्य नियोगतः ॥ ३४ ॥
जो संवर्तक अग्निदेव नित्य वड़वाग्निके रूपसे समस्त समुद्रोंका जल पीते रहते हैं, वे भी [मुझ] ईश्वरके अधीन हैं॥ ३४॥
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ।
अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छासनमधिष्ठिताः ॥ ३५ ॥
आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, मरुद्गण और अश्विनीकुमार तथा अन्य सभी देवगण मेरे ही अनुशासनमें रहते हैं॥ ३५॥
गन्धर्वा उरगा यक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।
भूतरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयम्भुवः ॥ ३६ ॥
गन्धर्व, सर्प, यक्ष, सिद्ध, साध्य, चारण, भूत, राक्षस, और पिशाच (सभी मुझ) स्वयम्भूके शासनाधीन हैं॥ ३६॥
कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।
ऋत्वब्दमासपक्षाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापतेः ॥ ३७ ॥

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