गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- रामगीता (२) * ४२५
युगमन्वन्तराण्येव मम तिष्ठन्ति शासने।
पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथापरे॥ ३८॥
कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात्रि, ऋतुएँ, वर्ष, मास और पक्ष—सभी [मुझ] प्रजापतिके शासनमें स्थित हैं। युग और मन्वन्तर, पर और परार्धादि जो कालके अन्य भेद हैं, वे भी मेरे ही अधीन रहते हैं॥ ३७-३८॥
चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।
नियोगादेव वर्तन्ते सर्वाण्येव स्वयम्भुवः॥ ३९॥
चार प्रकारके प्राणी, चर और अचर पदार्थ—सभी मुझ स्वयम्भू परमेश्वरकी ही आज्ञाका अनुसरण करते हैं॥ ३९॥
पत्तनानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात्।
ब्रह्माण्डानि च वर्तन्ते देवस्य परमात्मनः॥ ४०॥
सभी लोक और भुवन तथा ब्रह्माण्ड [मुझ] परमात्मदेवकी ही आज्ञामें रहते हैं॥ ४०॥
अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि ममाज्ञया।
प्रवृत्तानि पदार्थौघैः सहितानि समन्ततः॥ ४१॥
अतीतके भी असंख्य ब्रह्माण्ड अपने समस्त पदार्थ-समूहोंके साथ मेरी आज्ञासे ही संचालित हुए हैं॥ ४१॥
ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मगैः।
हरिष्यन्ति सहैवाज्ञां परस्य परमात्मनः॥ ४२॥
भविष्यमें भी वस्तुसमूहोंसे भरे जो ब्रह्माण्ड होंगे, वे [मुझ] परात्पर परमात्माकी आज्ञासे ही रहेंगे और समाप्त हो जायेंगे॥ ४२॥
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगान्मम वर्तते॥ ४३॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और प्राणी-पदार्थोंकी आदि प्रकृति मेरे ही अनुशासनमें रहती है॥ ४३॥