गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ * गीता-संग्रह *
याशेषसर्वजगतां मोहिनी सर्वदेहिनाम्।
मायापि वर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः॥ ४४॥
सभी संसार और प्राणिमात्रको मोहित करनेवाली जो मायाशक्ति (अविद्या) है, वह भी सदा [मुझ] परमेश्वरके अधीन है॥ ४४॥
विधूय मोहकलिलं यथा पश्यति तत्पदम्।
सापि विद्या महेशस्य नियोगाद्वशवर्तिनी॥ ४५॥
बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत्॥ ४६॥
मोहके कीचड़को हटाकर परमपदका दर्शन करानेवाली जो विद्या (ज्ञानशक्ति) है, वह भी [मुझ] परमेश्वरके अनुशासनमें ही रहती है। अधिक कहनेसे क्या लाभ है, यह सारा संसार मेरी ही शक्तिसे उत्पन्न है॥ ४५-४६॥
मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं व्रजेत्।
अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः॥ ४७॥
मुझसे ही इस संसारका भरण-पोषण होता है और मुझमें ही इसका लय होता है। मैं ही स्वयंप्रकाश, सनातन, सर्वेश्वर प्रभु हूँ॥ ४७॥
परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते।
इत्येतत्परमं ज्ञानं भवते कथितं मया॥ ४८॥
मैं ही परमात्मा, परब्रह्म हूँ; मुझसे अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह परम ज्ञान मैंने तुम्हारे लिये बता दिया॥ ४८॥
ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।
मायामाश्रित्य जातोऽहं गृहे दशरथस्य हि॥ ४९॥
इसे जानकर प्राणी जन्म और संसारके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मैंने अपनी मायाका आश्रय लेकर दशरथके घरमें [पुत्ररूपसे] जन्म लिया है॥ ४९॥