भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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* भगवतीगीता * ४३१


सभी प्राणियोंके कल्याणहेतु प्रकट हुई हैं। तब गिरिराजने भी कन्याको देखकर उसे जगदम्बिकाके रूपमें जाना। भूमिपर सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीसे वे देवीसे कहने लगे ॥ १२—१४ ॥

हिमालय उवाच

का त्वं मातर्विशालाक्षि चित्ररूपा सुलक्षणा।
न जाने त्वामहं वत्से यथावत्कथयस्व माम्॥ १५॥

**हिमालय बोले—**माता! विशालाक्षी! इस विलक्षण विचित्र रूपमें आप कौन हैं? पुत्री! मैं आपको नहीं जान पा रहा हूँ। मुझे यथावत् अपना वृत्तान्त बताइये॥ १५॥

श्रीदेव्युवाच

जानीहि मां परां शक्तिं महेश्वरकृताश्रयाम्।
शाश्वतैश्वर्यविज्ञानमूर्तिं सर्वप्रवर्तिकाम्॥ १६॥
ब्रह्मविष्णुमहेशादिजननीं सर्वमुक्तिदाम्।
सृष्टिस्थितिविनाशानां विधात्रीं जगदम्बिकाम्॥ १७॥
अहं सर्वान्तरस्था च संसारार्णवतारिणी।
नित्यानन्दमयी नित्या ब्रह्मरूपेश्वरीति च॥ १८॥
युवयोस्तपसा तुष्टा पुत्रीभावेन लीलया।
जाता तव गृहे तात बहुभाग्यवशात्तव॥ १९॥

**श्रीदेवी बोलीं—**परमेश्वर शिवकी आश्रिता मुझे पराशक्ति समझो। मैं सारी सृष्टिका संचालन करती हूँ तथा शाश्वत ज्ञान और ऐश्वर्यकी मूर्ति हूँ। मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिकी जन्मदात्री हूँ और सृष्टि, स्थिति, विनाशका विधान करनेवाली मुक्तिदायिनी जगदम्बिका हूँ। मैं सबकी अन्तरात्माके रूपमें स्थित हूँ और संसारसमुद्रसे उद्धार करनेवाली हूँ। मुझे नित्यानन्दमयी ब्रह्मरूपा नित्या महेश्वरी समझो। तात! तुम