गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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दोनोंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर मैंने अपनी लीलासे तुम्हारी पुत्री बनकर तुम्हारे घरमें जन्म लिया है। तुम बहुत भाग्यशाली हो॥ १६—१९॥
हिमालय उवाच
मातस्त्वं कृपया गृहे मम सुता जातासि नित्यापि यद्- भाग्यं मे बहुजन्मजन्मजनितं मन्ये महत्पुण्यदम्। दृष्टं रूपमिदं परात्परतरां मूर्तिं भवान्या अपि माहेशीं प्रति दर्शयाशु कृपया विश्वेशि तुभ्यं नमः॥ २०॥
**हिमालय बोले—**माता! आपने नित्या होकर भी कृपापूर्वक मेरे घरमें पुत्रीरूपसे जन्म लिया है, यह मेरे अनेक जन्मोंमें किये पुण्योंका ही फल है तथा इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। मैंने आपका यह रूप देख लिया। अब आप परात्पर भगवतीका दिव्य शिवप्रियारूप मुझे कृपापूर्वक शीघ्र ही दिखायें। विश्वेश्वरि! आपको नमस्कार है॥ २०॥
श्रीदेव्युवाच
ददामि चक्षुस्ते दिव्यं पश्य मे रूपमैश्वरम्। छिन्धि हृत्संशयं विद्धि सर्वदेवमयीं पितः॥ २१॥
**श्रीदेवी बोलीं—**पिताजी! मैं आपको दिव्य चक्षु प्रदान करती हूँ, जिनसे मेरे ऐश्वर्यशाली रूपके दर्शनकर आप अपने हृदयका संशय मिटा लीजिये और मुझे ही सर्वदेवमयी समझिये॥ २१॥
श्रीमहादेव उवाच
इत्युक्त्वा तं गिरिश्रेष्ठं दत्त्वा विज्ञानमुत्तमम्। स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं माहेश्वरं तदा॥ २२॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**ऐसा कहकर गिरिराज हिमवान्को दिव्य दृष्टि प्रदानकर जगदम्बाने अपने अलौकिक माहेश्वरस्वरूपके दर्शन कराये॥ २२॥