गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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समझता है। स्तुति या निन्दासे उसे क्षोभ क्यों होगा ? ॥ १० ॥
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥
स्थितप्रज्ञ एवं आश्चर्यरहित पुरुष इस विश्वको जादूका खेल समझता है। मौतको सामने देखकर भी भला वह क्यों डरेगा ? ॥ ११ ॥
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥
जिस महात्मा पुरुषका चित्त मोक्षपदके लिये भी विचलित नहीं होता; उस आत्मज्ञान-तृप्तकी समता भला किसके साथ की जा सकती है ? ॥ १२ ॥
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ १३ ॥
जो सहज ही यह जानता है कि यह सम्पूर्ण दृश्य वस्तुतः कुछ नहीं है, वह स्थितप्रज्ञ भला यह क्यों देखने लगा कि यह ग्राह्य है और यह त्याज्य है ? ॥ १३ ॥
अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये ॥ १४ ॥
जिसने अपने अन्तःकरणसे वासनाओंका रंग धो दिया है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंको भगा दिया है और आशा-तृष्णाको नष्ट कर दिया है, उसके सामने प्रारब्धवश जो भोग आते हैं, उससे उसे न सुख होता है, न दुःख ॥ १४ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाक्षेपद्वारोपदेशकं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥