गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अष्टावक्रगीता * ४८५
चौथा प्रकरण
आत्मज्ञानीकी स्थिति
हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥ १॥
यह सम्भव है कि स्थितप्रज्ञ आत्मज्ञानी पुरुष भी लीलापूर्वक भोगके खेल खेले, परंतु संसारका भार ढोनेवाले मूढ़ोंके साथ उसकी कोई तुलना नहीं है॥ १॥
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥ २॥
इन्द्रादि सारे देवता जिस पदकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दीन रहते हैं, बड़े आश्चर्यकी बात है कि उसी पदपर स्थित होकर भी तत्त्वज्ञानी योगीको हर्षरूप विकार नहीं प्राप्त होता॥ २॥
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥ ३॥
यद्यपि धुएँसे आकाश धूमिल-सा मालूम पड़ता है; परंतु वास्तवमें धुआँ उसे स्पर्श नहीं करता, ऐसे ही तत्त्वज्ञ पुरुषका पुण्य-पापसे (बाहरी सम्बन्ध दीखनेपर भी) भीतर किसी प्रकारका संस्पर्श नहीं होता॥ ३॥
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥ ४॥
जिस महापुरुषने इस तत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है कि यह सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप ही है, फिर यदि वह (प्रारब्धसे) स्वेच्छानुसार बर्ताव करे तो उसे भला कौन रोक सकता है?॥ ४॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥ ५॥
ब्रह्मासे तिनकेतक चार प्रकारके प्राणियोंमें एकमात्र तत्त्वज्ञ पुरुषकी